कैंसर की ज्यादातर दवाएं विदेश से क्यों मंगवाई जाती हैं? डॉक्टर से समझें इसकी सबसे बड़ी वजह

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Why Cancer Drugs Imported: भारत की फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री बेहद मजबूत होने के बावजूद कैंसर की आधुनिक और लाइफ सेविंग दवाएं विदेशों से इंपोर्ट की जाती हैं. इसका मुख्य कारण रिसर्च एंड डेवलपमेंट में लगने वाली भारी लागत, अंतरराष्ट्रीय पेटेंट कानून और क्लीनिकल ट्रायल की जटिल प्रक्रिया है. इसके अलावा दवाओं के कच्चे माल (API) की कमी और बायोसिमिलर्स बनाने की उच्च तकनीक का सीमित होना भी एक बड़ी चुनौती है.

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एडवांस टेक्नोलॉजी, क्लीनिकल ट्रायल्स, पेटेंट कानून और कच्चे माल जैसे फैक्टर्स के कारण यूरोप और अमेरिका कैंसर की ज्यादातर दवाएं बनाते हैं.

Cancer Treatment Medicines: कैंसर बेहद घातक बीमारी है, जो हर साल लाखों लोगों को मौत के घाट उतार देती है. कैंसर का नाम सुनकर ही लोगों के मन में डर बैठ जाता है. भारत में हर साल लाखों लोग इस घातक बीमारी की चपेट में आते हैं, लेकिन कैंसर के इलाज में एक बड़ी चुनौती दवाओं की उपलब्धता और उनकी भारी-भरकम कीमत है. अक्सर देखा गया है कि कैंसर की अधिकांश प्रभावी और आधुनिक दवाएं विदेशों से मंगवाई जाती हैं. भारत की फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री मजबूत होने के बावजूद जीवन रक्षक कैंसर की दवाएं अमेरिका और यूरोप जैसे देशों से मंगाई जाती हैं. आखिर क्या कारण है कि कैंसर का इलाज आज भी विदेशी दवाओं के भरोसे टिका है? चलिए इसके पीछे की बड़ी वजह समझ लेते हैं.

दिल्ली के गंगाराम हॉस्पिटल के सीनियर कैंसर स्पेशलिस्ट डॉ. श्याम अग्रवाल ने News18 को बताया कि कैंसर की दवाओं के विदेश से आने का सबसे बड़ा कारण रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) में लगने वाला लंबा समय और अरबों डॉलर का निवेश है. एक नई कैंसर दवा को लैब से क्लीनिक तक पहुंचने में औसतन 10 से 15 साल का समय लगता है. पश्चिमी देशों की बड़ी फार्मा कंपनियां इस पर भारी खर्च करती हैं. कैंसर की कोशिकाएं लगातार अपना स्वरूप बदलती रहती हैं, जिसके लिए बहुत ही सटीक और टारगेटेड थेरेपी की जरूरत होती है. भारत में अभी भी रिसर्च के लिए उस स्तर का बुनियादी ढांचा और फंडिंग की कमी है, जिसके कारण नई दवाओं का आविष्कार ज्यादातर विदेशों में ही होता है.

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डॉक्टर ने बताया कि कैंसर की किसी भी दवा को मंजूरी मिलने से पहले उसे क्लीनिकल ट्रायल के कई कठिन चरणों से गुजरना पड़ता है. यह सुनिश्चित करना होता है कि दवा सुरक्षित है और कैंसर कोशिकाओं को मारने में प्रभावी भी है. विकसित देशों में इन ट्रायल्स के लिए उन्नत तकनीक और डाटा विश्लेषण की बेहतर सुविधाएं मौजूद हैं. इसके अलावा जब कोई विदेशी कंपनी वर्षों की मेहनत और अरबों डॉलर खर्च करके नई दवा बनाती है, तो वह उस पर पेटेंट (Patent) ले लेती है. अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक संपदा (IP) कानूनों के तहत 20 साल तक कोई अन्य कंपनी उस दवा का जेनेरिक वर्जन नहीं बना सकती है. कैंसर की सबसे आधुनिक और प्रभावी दवाएं जैसे इम्यूनोथेरेपी और बायोलॉजिक्स पेटेंट के दायरे में होती हैं, इसलिए भारतीय कंपनियों के पास उन्हें बनाने का अधिकार नहीं होता है. ऐसे में भारतीय मरीजों को मजबूरन ये दवाएं विदेशी कंपनियों से आयात करनी पड़ती हैं.

भले ही भारत जेनेरिक दवाएं बनाने में दुनिया में आगे है, लेकिन दवाओं को बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल, जिसे एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) कहा जाता है, उसके लिए भारत काफी हद तक आयात पर निर्भर है. कैंसर की जटिल दवाओं के लिए आवश्यक विशिष्ट रसायनों और कच्चे माल का उत्पादन भारत में अभी भी सीमित है. दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाली उच्च तकनीक और रॉ मटेरियल की कमी के कारण भारतीय कंपनियां कई बार आधुनिक कैंसर दवाओं के उत्पादन में पिछड़ जाती हैं और आयात का रास्ता चुनना पड़ता है.

एक्सपर्ट ने बताया कि कैंसर का इलाज अब सामान्य कीमोथेरेपी से आगे बढ़कर पर्सनलाइज्ड मेडिसिन और जीन थेरेपी की ओर जा रहा है. ये दवाएं रासायनिक रूप से नहीं, बल्कि जीवित कोशिकाओं से बनाई जाती हैं, जिन्हें बायोसिमिलर्स या बायोलॉजिक्स कहते हैं. इन्हें बनाने के लिए अत्यधिक एडवांस बायोटेक लैब की आवश्यकता होती है. अमेरिका और यूरोप में ये तकनीक दशकों से विकसित है. भारत में अब इस दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं, लेकिन वर्तमान में सबसे प्रभावी बायोलॉजिकल दवाएं अभी भी विदेशी लैब से ही आयात की जा रही हैं.

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अमित उपाध्याय

अमित उपाध्याय News18 Hindi की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें

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