कफ सिरप में क्यों मिलाया जाता है प्रोपलीन ग्लाइकोल? किन दवाओं में होता है यूज, क्या यह भी खतरनाक, डॉक्टर से समझें

Propylene Glycol in Cough Syrups: मध्य प्रदेश में छिंदवाड़ा जिले में खांसी का सिरप कोल्ड्रिफ (Coldrif) पीने से अब तक 14 बच्चों की मौत हो चुकी है. यह सिरप तमिलनाडु की स्रेसन फार्मास्यूटिकल कंपनी ने बनाया था. जब इस सिरप की जांच की गई, तो इस सिरप में डाइएथिलीन ग्लाइकोल (DEG) नामक जहरीला केमिकल मिला, जो इंडस्ट्रीज में पेंट और प्लास्टिक बनाने में इस्तेमाल किया जाता है. इस केमिकल को दवाओं में मिलाना सुरक्षित नहीं माना जाता है, लेकिन इसके बावजूद कई कंपनियां प्रोपलीन ग्लाइकोल (PG) की जगह डाइएथिलीन ग्लाइकोल (DEG) ओर एथिलीन ग्लाइकोल (EG) जैसे खतरनाक केमिकल मिलाकर सिरप बेच रही हैं.

राजस्थान और एमपी में कफ सिरप पीने से कई बच्चों की मौत के मामले सामने आए हैं. इन घटनाओं पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने सरकार को एक पत्र लिखकर बताया है कि खांसी की दवा बनाने में फार्मास्युटिकल-ग्रेड ग्लिसरीन और प्रोपलीन का इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि ये दोनों चीजें महंगी होती हैं, जिसकी वजह से दवा निर्माता कंपनियां कफ सिरप में इंडस्ट्रियल-ग्रेड डाइएथिलीन ग्लाइकोल (DEG) ओर एथिलीन ग्लाइकोल (EG) जैसे खतरनाक केमिकल्स मिला देती हैं. अगर निर्माता कंपनी और रेगुलेटरी दोनों ही इन दवाओं की क्वालिटी की जांच में चूक जाएं, तो ऐसे सिरप जहरीले बन जाते हैं. इससे छोटे बच्चों की किडनी फेल हो सकती है और सीवियर मामलों में मौत भी हो जाती है. ऐसा पहले भी कई देशों में हो चुका है.

कफ सिरप में क्यों मिलाया जाता है प्रोपलीन ग्लाइकोल?

नई दिल्ली के मूलचंद हॉस्पिटल के पूर्व पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. भगवान मंत्री ने News18 को बताया कि कफ सिरप में कई चीजें मिलाई जाती हैं, ताकि दवाई का प्रॉपर घोल बन सके और वह स्टेबल रहे. कफ सिरप में प्रोपलीन ग्लाइकोल (PG) मिलाया जाता है, ताकि दवा लिक्विड फॉर्म में बनी रही और स्टेबल रहे. प्रोपलीन ग्लाइकोल का उपयोग सिर्फ कप सिरप में ही नहीं, बल्कि कई अन्य दवाओं और फार्मास्यूटिकल फॉर्मूलेशंस में किया जाता है. कई क्रीम, लोशन, जेल और इंजेक्शंस में प्रोपलीन ग्लाइकोल यूज होता है. कॉस्मेटिक और ब्यूटी प्रोडक्ट्स में भी इसे मिलाया जाता है. यूएस FDA ने प्रोपलीन ग्लाइकोल को जनरली रिकग्नाइज्ड एज सेफ (GRAS) के रूप में अप्रूव किया है. जब सीमित मात्रा और USP ग्रेड में यह दवाओं में इस्तेमाल किया जाए, तो यह सेहत के लिए नुकसानदायक नहीं होता है. हालांकि ज्यादा मात्रा में मिलाने पर खतरनाक हो सकता है.

किन परिस्थितियों में प्रोपलीन ग्लाइकोल हानिकारक होता है?

डॉक्टर ने बताया कि कफ सिरप और अन्य दवाओं में प्रोपलीन ग्लाइकोल को सॉल्वेंट, को सॉल्वेंट, ह्यूमेक्टेंट और स्टेबलाइजर के रूप में शामिल किया जाता है, ताकि दवाई घुलनशील, स्थिर और उपयोगी बने रह सके. सामान्य उपयोग में यह सुरक्षित माना जाता है. प्रोपलीन ग्लाइकोल आमतौर पर सुरक्षित होता है, लेकिन अगर यह ज्यादा मात्रा में लिया जाए या लगातार उपयोग किया जाए, तो मेटाबॉलिक एसिडोसिस, हाइपरोस्मोलालिटी जैसी समस्याएं हो सकती हैं. इंट्रावेनस (IV) उपयोग में अचानक या तेजी से देने पर सीएनएस दबाव, एरिदिमिया, रेस्पिरेटरी डिप्रेशन जैसे गंभीर लक्षण हो सकते हैं. नवजात शिशुओं और लिवर-किडनी के मरीजों को इसका बेहद सावधानी के साथ इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

डाइएथिलीन ग्लाइकोल और एथिलीन ग्लाइकोल क्या हैं?

एक्सपर्ट ने बताया कि डाइएथिलीन ग्लाइकोल (DEG) और एथिलीन ग्लाइकोल (EG) दोनों ही एक प्रकार के इंडस्ट्रियल केमिकल्स हैं, जो प्लास्टिक, पेंट, ब्रेक फ्लूड और एंटीफ्रीज जैसे प्रोडक्ट्स में उपयोग किए जाते हैं. ये केमिकल्स रंगहीन, गंधहीन और मीठे स्वाद वाले होते हैं, लेकिन अत्यधिक टॉक्सिक होते हैं. इनका मानव शरीर पर बहुत बुरा असर पड़ता है. इनकी थोड़ी सी मात्रा भी गंभीर किडनी फेलियर, लिवर डैमेज, ब्रेन पर असर और मौत का कारण बन सकती है. दवाओं में इनका उपयोग नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन कई बार सस्ते और घटिया स्तर के सॉल्वेंट्स या सिरप को पतला करने वाले एजेंट्स के तौर पर इनका मिलावटी उपयोग कर लिया जाता है. पिछले कुछ सालों में भारत और अन्य देशों में बच्चों की मौत के कई मामले ऐसे सामने आए हैं, जहां कफ सिरप में DEG और EG की मौजूदगी पाई गई थी.

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