घर में खुदाई की तो निकली पत्नी की लाश: पुलिस ने पति को गिरफ्तार किया, 10 साल बाद खुलासा… कातिल कोई और था – Madhya Pradesh News

मध्यप्रदेश क्राइम फाइल्स में इस बार बात एमपी के सीधी जिले के गांव दियाडोल में हुए उस जघन्य हत्याकांड की, जिसमें महिला की हत्या कर शव को घर में ही दफना दिया गया था। दस साल पहले 14 अक्टूबर 2015 को हुए हत्याकांड में पति को हत्यारा मान कर कोर्ट ने सजा सु

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गायब पत्नी और एक झूठी कहानी दियाडोल गांव में पप्पू पांडे अपनी पत्नी के साथ रहता था। उसका गांव में किसी से ज्यादा मेलजोल नहीं था। उसका रूटीन तय था – काम पर जाना और सीधा घर लौट आना। उसकी पत्नी, जो शांत स्वभाव की थी, अक्सर घर में ही रहती थी। हालांकि, कुछ महीने पहले उसके मायके वालों से हुई खटपट की बातें गांव में दबी जुबान में फैली थीं। कहा जाता था कि पप्पू उसे दहेज के लिए ताने देता था – ‘तेरे घरवालों ने दिया ही क्या है!’

इसी बीच 14 अक्टूबर की दोपहर के बाद से किसी ने भी पप्पू की पत्नी को नहीं देखा था। जब पड़ोसियों ने हिम्मत करके पूछा, तो पप्पू ने लापरवाही से जवाब दिया, “वो मायके चली गई है।” लेकिन यह झूठ ज्यादा देर टिक नहीं सका। किसी ने उसके मायके फोन किया और पता चला कि वो तो वहां पहुंची ही नहीं।अब गांव वालों का शक गहराने लगा। शाम होते-होते कुछ लोग हिम्मत करके उसके घर के पास जमा हो गए।

चाची का कबूलनामा: ‘पप्पू ने अपनी बीवी को मार दिया है’ अगले दिन, इस कहानी में सबसे बड़ा मोड़ आया। पप्पू की चाची, राजकुमारी देवी, बदहवास हालत में गांव के दूसरे छोर पर रहने वाले अपने बेटे रामलाल के घर पहुंची। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था और होंठ डर से कांप रहे थे। उसने कांपती आवाज में अपने बेटे से कहा, ‘पप्पू ने… अपनी बीवी को मार दिया है।’

रामलाल को पहले तो अपनी मां की बातों पर यकीन नहीं हुआ। लेकिन राजकुमारी ने रोते हुए बताया, ‘उसने खुद मुझसे कहा… बोला कि गुस्से में कुल्हाड़ी चल गई… और फिर उसने लाश को आंगन में ही गाड़ दिया।’ यह सुनते ही रामलाल के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने फौरन गांव के सरपंच को फोन किया। सरपंच ने मामले की गंभीरता को समझते हुए पुलिस को सूचित करने की सलाह दी।

जब आंगन ने उगली लाश 15 अक्टूबर की सुबह तक पप्पू पांडे का घर एक तमाशे में तब्दील हो चुका था। सैकड़ों लोगों की भीड़ जमा थी। पुलिस ने घर खोलने की कोशिश की। किसी ने बताया कि घर की एक चाबी चाची राजकुमारी देवी के पास रहती है। जब पुलिस ने राजकुमारी से पूछा, तो उसने घबराकर कहा, ‘मुझे कुछ याद नहीं, मेरे पास कोई चाबी नहीं है।’

आखिरकार, पुलिस ने दरवाजा तोड़ा और अंदर दाखिल हुई। घर के अंदर का माहौल ठंडा और भयानक था। सबकी नजरें आंगन के उस कोने पर थीं, जहां की मिट्टी नम थी। पुलिस ने फावड़ा मंगवाया। जैसे ही पहला फावड़ा चला और मिट्टी हटी, जमीन से एक तेज सड़ांध उठी, जिसने सबको कुछ कदम पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। पुलिस ने खुदाई जारी रखी।

कुछ ही मिनटों के भीतर मिट्टी के नीचे से एक औरत की साड़ी का किनारा नजर आया। पूरा सच सामने था। लाश की गर्दन पर एक गहरा और क्रूर घाव था। गांव की औरतें दहाड़ें मारकर रोने लगीं – ‘अरे, ये तो वही है… पप्पू की पत्नी!’ पुलिस ने लाश को बरामद कर आगे की कार्रवाई शुरू की।

जांच, गिरफ्तारी और कहानी में पहली दरार गांव में तरह-तरह की कहानियां फैलने लगीं। किसी ने कहा कि रात में पति-पत्नी का भयंकर झगड़ा हुआ था। किसी ने कहा कि पप्पू शराब के नशे में था। लेकिन जब पुलिस को पप्पू मिला, तो वह खामोश था। उसने बस इतना कहा, ‘मैंने कुछ नहीं किया।’ 15 अक्टूबर को उसके बयान दर्ज हुए और 16 अक्टूबर को उसे आधिकारिक तौर पर गिरफ्तार कर लिया गया।

उसी दिन पुलिस ने उसके घर से एक कुल्हाड़ी बरामद की और दावा किया कि यही वो हथियार है, जिससे पप्पू ने अपनी पत्नी की हत्या की थी। पुलिस के पास अब एक लाश थी, एक कथित हत्या का हथियार था और दो मुख्य गवाह थे – राजकुमारी देवी और उसका बेटा रामलाल। केस बिल्कुल सीधा और साफ लग रहा था। लेकिन कहानी में असल झोल अब शुरू होने वाला था।

अदालत में ढह गया केस, गवाह मुकरे, सबूत कमजोर पड़े

जब मामला कोर्ट पहुंचा, तो अभियोजन पक्ष का पूरा केस ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगा।

गवाहों का यू-टर्न: राजकुमारी देवी और रामलाल, जिनके बयानों पर पूरा केस टिका था, अदालत में अपने बयान से पलट गए। राजकुमारी ने कहा, ‘मैंने ऐसा कुछ नहीं सुना था। पुलिस ने मुझसे जबरदस्ती यह सब कहलवाया था।’ उसके बेटे रामलाल ने भी यही दोहराया कि न तो उसकी मां ने उसे कुछ बताया और न ही उसने पुलिस को कोई बयान दिया था।

कुल्हाड़ी पर नहीं था खून: पुलिस का सबसे बड़ा सबूत, यानी हत्या में इस्तेमाल की गई कुल्हाड़ी, फॉरेंसिक जांच में फेल हो गई। एफएसएल (FSL) की रिपोर्ट ने सबको चौंका दिया। रिपोर्ट में साफ लिखा था – “Negative for human blood traces” (मानव रक्त के कोई निशान नहीं मिले)। यह पुलिस की थ्योरी पर सबसे बड़ी चोट थी।

गिरफ्तारी की तारीख में हेरफेर: अदालत में यह भी सामने आया कि पप्पू की गिरफ्तारी के कागजात में हेरफेर की गई थी। पुलिस का दावा था कि उसे 16 अक्टूबर को गिरफ्तार किया गया, लेकिन रिकॉर्ड के कुछ पन्नों पर तारीख 15 अक्टूबर लिखी थी और कई जगह ओवरराइटिंग की गई थी। बचाव पक्ष ने आरोप लगाया कि पप्पू को 15 अक्टूबर को ही अवैध रूप से हिरासत में ले लिया गया था और कहानी को फिट करने के लिए बाद में तारीख बदली गई।

आरोपी के पक्ष में सबूत: केस में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब पप्पू पांडे के पक्ष में बृजलाल लोनी नाम का एक गवाह पेश हुआ। बृजलाल ने अदालत को बताया कि 14 अक्टूबर, यानी हत्या वाले दिन, पप्पू पांडे उसके यहां बंजारी गांव में काम कर रहा था, जो घटनास्थल से 10 किलोमीटर दूर है। उसने कहा, ‘मैं घर बनवा रहा था और पप्पू मेरे यहां मजदूरी कर रहा था। मैंने अपनी बेटी के रजिस्टर में उसकी हाजिरी और भुगतान का पूरा हिसाब लिखा है।’

सजा, सवाल और 10 साल का इंतजार इतने सारे झोल और कमजोरियों के बावजूद, ट्रायल कोर्ट ने 27 सितंबर 2016 को अपना फैसला सुनाया। पप्पू पांडे को अपनी पत्नी की हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई। गांव में लोगों ने कहा, ‘इंसाफ हो गया।’ लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा कि जो कहानी अदालत में बुनी गई थी, उसमें कितने छेद थे।

पप्पू पांडे जेल चला गया। 10 साल बीत गए। वह हर बार यही कहता रहा, ‘मैंने कुछ नहीं किया।’ जेल से ही उसने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में अपील की। मामला न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन की बेंच के पास पहुंचा। कोर्ट ने जब इस केस की फाइलें दोबारा खोलीं, तो जांच की परतें एक-एक कर उधड़ने लगीं।

क्राइम फाइल्स के पार्ट 2 में जानिए इन सवालों के जवाब

  • कैसे हाईकोर्ट की जांच में झूठ के धागे खुलते गए?
  • क्यों एफएसएल रिपोर्ट ने पुलिस की जांच को बेनकाब कर दिया?
  • किस तरह हाईकोर्ट ने कहा – “संदेह का लाभ हमेशा आरोपी को मिलेगा” और क्यों?
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