दिव्यांग युवाओं की अनोखी पहल, कचरे को निखार बना डाला काम का सामान

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Khandwa News: बूटे के छिलकों से बनी गुड़िया, गोबर से बनी भगवान की मूर्तियां और पुराने कपड़ों से बने सजावटी सामान, ये सब प्रोडक्ट अब खंडवा की पहचान बनते जा रहे हैं. ये दिव्यांग युवक केवल कलाकार नहीं हैं बल्कि समाज में बदलाव लाने वाले सच्चे नायक हैं.

खंडवा. मध्य प्रदेश के खंडवा शहर में रहने वाले कुछ दिव्यांग युवकों ने यह साबित कर दिया है कि जुनून और हुनर के सामने कोई भी कमी आड़े नहीं आती. जहां लोग कचरे को फेंक देते हैं, वहीं ये युवा उनमें कला तलाशते हैं. बूटे के छिलके से गुड़िया, पुराने कपड़ों से सजावटी सामान और गोबर से भगवान की मूर्तियां और दीये बनाकर ये साबित कर रहे हैं कि वेस्ट मैटेरियल को भी बेस्ट में बदला जा सकता है. इन दिव्यांग बच्चों का हौसला किसी आम इंसान से कहीं ज्यादा बुलंद है. पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने अपने हुनर को भी तराशा और अब वे समाज के लिए प्रेरणा बन गए हैं.

एक युवक ने कहा कि लोग जो चीजें फेंक देते हैं, वे उन्हें देखकर सोचते हैं कि इनसे क्या नया बनाया जा सकता है. बूटे के छिलके से जब पहली बार गुड़िया बनाई, तो सबको बहुत पसंद आई. फिर गोबर से भगवान की मूर्तियां बनाईं, जो पूजा के काम भी आती हैं, साथ ही गोबर से दीपक भी बनाए, जो एकदम इको फ्रेंडली हैं और सस्ते भी हैं और पर्यावरण के अनुकूल भी हैं.

प्लास्टिक या केमिकल का इस्तेमाल नहीं
इन युवा कलाकारों की सबसे खास बात यह है कि वे जो भी चीज बनाते हैं, वो पूरी तरह इको फ्रेंडली होती है. बूटे यानी कपास के छिलकों को सुखाकर वे गुड़िया बनाते हैं, जिसमें किसी तरह के प्लास्टिक या केमिकल का इस्तेमाल नहीं होता है. वहीं गाय के गोबर से बनी मूर्तियां मिट्टी में भी घुल जाती हैं, जिससे प्रदूषण नहीं होता. वे गोबर से ही दीये भी बनाते हैं जोकि बिल्कुल नैचुरल होते हैं.

प्रोडक्ट सस्ते भी और स्वदेशी भी
स्थानीय निवासी भावेश पटेल ने लोकल 18 से कहा कि हमने इनकी बनाई मूर्तियां खरीदी हैं और बच्चों को गुड़िया भी दिलवाई है. ये प्रोडक्ट सस्ते भी हैं और स्वदेशी भी. सबसे अच्छी बात यह है कि इन्हें खरीदकर हमें लगता है कि हम किसी नेक काम में भागीदार बन रहे हैं. इनके इस अनोखे काम से न सिर्फ पर्यावरण को फायदा हो रहा है बल्कि दिव्यांग युवाओं को प्रेरणा भी मिल रही है कि वे भी कुछ अलग कर सकते हैं. अब ये युवा दूसरों को भी प्रशिक्षण देने में जुटे हैं ताकि और लोग आत्मनिर्भर बन सकें. वह चाहते हैं कि और भी लोग ये काम सीखें, खासकर वे लोग जो खुद को असहाय समझते हैं. हम सबके अंदर कुछ न कुछ हुनर होता है, बस जरूरत है उसे पहचानने की.

गौरतलब है कि बूटे के छिलकों से बनी गुड़िया, गोबर से बने भगवान और पुराने कपड़ों से बने सजावटी सामान, ये सब अब खंडवा की पहचान बनते जा रहे हैं. ये दिव्यांग युवक केवल कलाकार नहीं बल्कि समाज में बदलाव लाने वाले सच्चे नायक हैं.

Rahul Singh

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.

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