घर में न टीवी, न हाथ में पैसे! पर था डॉक्टर बनने का जुनून, 2 बार फेल होने के बाद दिनकर ने रचा इतिहास

पूर्णिया: कहते हैं असफलता ही सफलता की पहली सीढ़ी होती है. अक्सर लोग पहली हार के बाद ही अपने सपनों का गला घोंट देते हैं, लेकिन जो गिरकर संभलना जानते हैं, इतिहास वही रचते हैं. पूर्णिया के डॉ.दिनकर मिश्रा की कहानी कुछ ऐसी ही है. जीवन के कड़े संघर्षों को झेलते हुए उन्होंने न केवल अपने पिता का मान बढ़ाया. बल्कि यह भी साबित कर दिया कि एक साधारण सरकारी स्कूल से पढ़ा हुआ छात्र भी देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक नीट को क्रैक कर सकता है.

शिक्षक पिता का कड़ा अनुशासन और टीवी से दूरी
डॉ.दिनकर मिश्रा मूल रूप से पूर्णिया जिले के सरसी (चिकनी गांव) के रहने वाले हैं. उनके पिता बिहार सरकार में एक सरकारी शिक्षक थे. एक मध्यमवर्गीय परिवार, जिसमें भाई-बहनों की संख्या अधिक और पिता का वेतन कम था. वहां उच्च शिक्षा का सपना देखना भी किसी चुनौती से कम नहीं था. डॉ.दिनकर बताते हैं कि उनके पिता पढ़ाई को लेकर बेहद सख्त थे. जब तक वे लोग घर में रहे, पिता ने कभी घर में टीवी नहीं लगने दिया ताकि बच्चों की एकाग्रता भंग न हो. पिता की प्राथमिकता केवल बच्चों की शिक्षा थी. कम वेतन के बावजूद उन्होंने अपने दो बेटों और दो बेटियों की पढ़ाई के लिए अपनी जमापूंजी लगा दी ताकि उन्हें बेहतर माहौल और उच्च शिक्षा मिल सके.

सरकारी स्कूल से शुरू हुआ सफर
डॉ.दिनकर की प्रारंभिक शिक्षा पूर्णिया के अलग-अलग सरकारी स्कूलों में हुई. आगे की पढ़ाई के लिए वे हॉस्टल में रहे, जिस कारण घर आना कम होता था. वे याद करते हुए कहते हैं कि जब भी घर आते और पढ़ाई में ढील देते, तो पिता के हाथों डंडे भी खाने पड़ते थे. यही अनुशासन आज उनकी सफलता का आधार बना है.

बिना करोड़ों खर्च किए भी बन सकते हैं डॉक्टर
समाज में एक बड़ी मिथ्या है कि डॉक्टर बनने के लिए करोड़ों रुपये चाहिए. डॉ.दिनकर इस भ्रम को तोड़ते हुए कहते हैं कि अगर आपके पास पैसे नहीं हैं, फिर भी आप डॉक्टर बन सकते हैं. बशर्ते आपकी मेहनत और लगन सच्ची हो. सरकारी स्कूलों में पढ़कर भी आप नीट जैसी प्रतियोगिता परीक्षा पास कर सकते हैं. यदि आप सरकारी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पा लेते हैं, तो बहुत ही कम खर्च में आप एक विश्वस्तरीय डॉक्टर बन सकते हैं.

दो बार मिली हार, फिर कोटा में रचा इतिहास
मैट्रिक के बाद डॉ. दिनकर आगे की तैयारी के लिए पटना चले गए. वहां उन्होंने लगातार दो बार मेडिकल की प्रवेश परीक्षा दी, लेकिन दोनों बार उन्हें असफलता हाथ लगी. दो बार फेल होने के बाद उनके सपने टूटने लगे थे और परिवार की उम्मीदें भी धुंधली पड़ने लगी थीं. लेकिन डॉ.दिनकर के अंदर डॉक्टर बनने की जिद अभी बाकी थी. उन्होंने हिम्मत जुटाई और अपने पिता से एक आखिरी मौका मांगा. पिता ने भरोसा जताया और उन्हें राजस्थान के कोटा भेजा. कोटा में डॉ.दिनकर ने दिन-रात एक कर दिया और आखिरकार अपनी तीसरी कोशिश में नीट की परीक्षा पास कर ली. उनकी इस सफलता ने पूरे परिवार को खुशियों से भर दिया.

IGIMS से पढ़ाई और अब समाजसेवा
सफलता के बाद उन्होंने पटना के प्रतिष्ठित IGIMS से अपनी मेडिकल की पढ़ाई पूरी की. आज डॉ.दिनकर मिश्रा पूर्णिया के लाइन बाजार में अयाची हॉस्पिटल के निदेशक के रूप में कार्यरत हैं. वे न केवल एक सफल डॉक्टर हैं, बल्कि कम संसाधनों वाले मरीजों की सेवा कर अपने पिता के समाजसेवा के संकल्प को भी आगे बढ़ा रहे हैं. डॉ.दिनकर का जीवन संदेश स्पष्ट है हार मत मानिए, क्योंकि कभी-कभी आखिरी चाबी ही ताला खोलती है.

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