4 घंटे पहले
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आज (29 सितंबर) नवरात्रि के आठवां दिन है, लेकिन तिथि सप्तमी है। सप्तमी तिथि पर देवी कालरात्रि की पूजा की जाती है। कालरात्रि का स्वरूप बहुत डरावना है। मां दुर्गा के इस स्वरूप की पूजा करने से भक्तों के सभी भय दूर होते हैं और शत्रुओं से रक्षा होती है। देवी को गुड़ का भोग खासतौर पर लगाना चाहिए।


देवी कालरात्रि की कथा
पौराणिक कथा है कि शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज नाम के तीन असुरों थे। इन तीनों ने स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल लोक में आतंक मचा रखा था। इन असुरों की वजह से सभी देवता भी बहुत दुखी थे। दुखी देवता भगवान शिव के पास पहुंचे।
देवताओं को दुखी देखकर शिव जी ने पार्वती से कहा कि आप इन तीनों असुरों का संहार करें और सृष्टि की रक्षा करें। शिव जी की बात सुनकर देवी पार्वती ने मां दुर्गा का रूप धारण करके शुंभ-निशुंभ का वध कर दिया, लेकिन देवी दुर्गा रक्तबीज का वध नहीं कर पा रही थीं।
रक्तबीज को वरदान मिला हुआ था कि जहां-जहां उसके रक्त की बूंदे गिरेंगी, वहां-वहां से कई और रक्तबीज पैदा हो जाएंगे। बहुत सारे रक्तबीजों को देखकर देवी दुर्गा क्रोधित हो गईं और क्रोध में देवी ने कालरात्रि का रूप धारण कर लिया।
कालरात्रि ने रक्तबीज के रक्त की बूंदों को धरती पर गिरने नहीं दिया और कटोरे में भरकर पी गईं। इस कारण ज्यादा रक्तबीज पैदा नहीं हो पाए और कालरात्रि ने रक्तबीज का वध कर दिया।
देवी कालरात्रि की सीख
देवी कालरात्रि ने रक्तबीज को खत्म करने के लिए उसके रक्त की बूंदे धरती पर गिरने ही नहीं दीं और उसे खत्म कर दिया। यहां रक्तबीज एक समस्या की तरह है और जहां-जहां रक्तबीज के रक्त की बूंदें गिर रही थीं, वहां-वहां से नए रक्तबीज यानी नई समस्याएं प्रकट हो रही थीं। तब देवी ने रक्तबीज के रक्त की बूंदों को जमीन पर गिरने ही नहीं दिया, यानी समस्याओं की जड़, समस्याओं की वजह को पनपने नहीं दिया और फिर मूल समस्या यानी रक्तबीज का वध कर दिया। देवी ने संदेश दिया है कि हमें भी अपनी समस्याओं की जड़ यानी वजह को समझना चाहिए। जब हम समस्या की वजह खत्म कर देते हैं तो वह समस्या हमेशा के लिए खत्म होती है।
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