42 मिनट पहलेलेखक: गौरव तिवारी
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कुछ लोगों के लिए फोन कॉल एक उम्मीद की तरह होता है। जबकि कुछ लोगों को फोन की घंटी बजते ही घबराहट होने लगती है। उनकी हार्ट बीट बढ़ जाती है, पसीना आने लगता है। वे फोन नहीं रिसीव कर पाते हैं।
अगर किसी के साथ ऐसा हो रहा है तो ये टेलिफोबिया के कारण हो सकता है। यह एक तरह का सोशल एंग्जाइटी डिसऑर्डर है, जिसमें शख्स सोशल लाइफ से दूरी बनाने लगता है।
टेलिफोबिया होने पर फोन कॉल करने और रिसीव करने दोनों में डर लगता है।
आज जरूरत की खबर में टेलिफोबिया के बारे में बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि-
- फोन कॉल से डर क्यों लगता है?
- ये युवाओं में क्यों कॉमन है?
- इसे कैसे ठीक कर सकते हैं?
एक्सपर्ट: डॉ. एम.एस. पांडुरंग, सीनियर कंसल्टेंट, न्यूरोलॉजी, धर्मशिला नारायणा हॉस्पिटल, दिल्ली
सवाल- टेलिफोबिया क्या होता है? यह फोन पर बात करने की सामान्य झिझक से कैसे अलग है?
जवाब- टेलिफोबिया को फोन एंग्जाइटी भी कहा जाता है। इसमें व्यक्ति को फोन कॉल करने या उठाने से डर लगता है। यह डर सिर्फ असहजता नहीं है, बल्कि मेंटल स्ट्रेस से जुड़ा होता है। सामान्य झिझक में व्यक्ति थोड़ी हिचक के बाद कॉल कर लेता है।
- टेलिफोबिया में व्यक्ति कॉल को टालता रहता है।
- कॉल से पहले उसके दिल की धड़कन बढ़ जाती है।
- दिमाग में नेगेटिव बातें चलने लगती हैं।
- व्यक्ति मैसेज को ज्यादा सुरक्षित विकल्प मानता है।
- यह सोशल एंग्जाइटी का एक रूप है।
- अगर यह डर डेली लाइफ के काम बिगाड़ने लगे, तो सिर्फ झिझक भर नहीं रह जाता है।

सवाल- टेलिफोबिया के लक्षण क्या हैं? इसे कैसे पहचानेंगे?
जवाब- इसमें आमतौर पर फोन की घंटी बजते ही घबराहट महसूस होती है।
- कॉल देखते ही तनाव बढ़ जाता है।
- कॉल करने से पहले पसीना आने लगता है या हाथ कांपने लगते हैं।
- क्या बोलेंगे, क्या बात करेंगे, जैसे सवाल बहुत परेशान करते हैं।
- इसमें शख्स कॉल को जानबूझकर टालता रहता है।
- मिस्ड कॉल देखकर भी कॉल बैक नहीं करता है।
- कॉल के बाद अजीब सी थकान महसूस करता है।
सभी लक्षण ग्राफिक में देखिए-

सवाल- टेलिफोबिया क्यों होता है?
जवाब- इसमें शख्स किसी पुरानी घटना या बात को लेकर इतना डर जाता है कि उसे कुछ गलत हो जाने का डर सताता रहता है। किसी से बात करते समय कुछ गलत बोल देने या गलत हो जाने का डर ही इसकी बड़ी वजह है। इसके और भी कई कारण हैं-
- जज किए जाने का डर रहता है।
- चेहरे के हाव-भाव न दिखने से असहजता बढ़ती है।
- किसी तरह की सोशल एंग्जाइटी हो सकती है।
- कॉल को लेकर पुराने एक्सपीरियंस खराब हो सकते हैं।
- कॉल पर सामने वाले व्यक्ति की बात का तुरंत जवाब देने का अनचाहा दबाव होता है।
- मैसेज पर ज्यादा बात करने से कॉल पर बात करने की स्किल कमजोर हो जाती है।
- आत्मविश्वास की कमी इस डर को और बढ़ा देती है।
सवाल- क्या इस फोबिया का कोई कनेक्शन कोविड, वर्क फ्रॉम होम और सोशल मीडिया से है?
जवाब- कोविड के दौरान लोगों की बातचीत पूरी तरह डिजिटल हो गई। फोन कॉल और वीडियो कॉल अचानक बहुत बढ़ गए। इससे कई लोगों की एंग्जाइटी ट्रिगर हो गई।
- वर्क फ्रॉम होम में आमने-सामने बातचीत कम हो गई।
- सोशल स्किल्स का अभ्यास घटता गया।
- सोशल मीडिया ने मैसेज को आसान बना दिया।
- लोग सोच-समझकर जवाब देने के आदी हो गए।
- रियल टाइम बातचीत मुश्किल लगने लगी।
इस तरह की आदतें अक्सर आगे चलकर टेलिफोबिया में बदल जाती हैं।
सवाल- क्या टेलिफोबिया कोई मेंटल हेल्थ कंडीशन है?
जवाब- नहीं, हर मामले में टेलिफोबिया मेंटल हेल्थ कंडीशन नहीं होता है।
- कई मामलों में यह सोशल एंग्जाइटी के कारण हो सकता है।
- लो सेल्फ कॉन्फिडेंस भी वजह हो सकती है।
- कभी-कभी यह जनरल एंग्जाइटी डिसऑर्डर के कारण होता है।
- कुछ लोगों में यह सिर्फ लाइफस्टाइल से जुड़ा डर होता है।
अगर टेलिफोबिया के कारण रोज के काम और रिश्ते बिगड़ रहे हैं तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए। जरूरत पड़ने पर एक्सपर्ट से सलाह जरूर लें।

सवाल- क्या टेलिफोबिया एक तरह की एंग्जाइटी है?
जवाब- हां, टेलिफोबिया एंग्जाइटी से जुड़ी समस्या है।
- इसे सोशल एंग्जाइटी का हिस्सा माना जाता है।
- इसमें डर वास्तविक खतरे से ज्यादा मानसिक होता है।
- टोलिफोबिया में एंग्जाइटी जैसे लक्षण दिखते हैं।
- कॉल एक तरह का ट्रिगर बन जाता है।
- दिमाग में पहले से नकारात्मक बातें आने लगती हैं।
- व्यक्ति खुद को असुरक्षित महसूस करता है।
- यही एंग्जाइटी फोन से दूरी बढ़ाती है।
सवाल- क्या टेलिफोबिया आज की युवा पीढ़ी में कॉमन है?
जवाब- हां, यह युवाओं में काफी तेजी से बढ़ रहा है।
- खासकर Gen Z कॉल पर खुद को ज्यादा असहज महसूस करते हैं।
- मिलेनियल्स में भी कुछ हद तक कॉल एंग्जाइटी देखने को मिलती है।
- मैसेज और चैट इनकी पहली पसंद होती है।
- फोन कॉल उन्हें ज्यादा पर्सनल और प्रेशर वाला काम लगता है।
- यही वजह है कि यह एक कॉमन समस्या बन रही है।
सवाल- टेलिफोबिया से रिश्ते, दोस्ती, परिवार और ऑफिस पर क्या असर पड़ता है?
जवाब- सबसे पहले तो कॉल अवॉइड करने से रिश्तों में दूरी आती है। दोस्त और परिवार खुद को इग्नोर्ड महसूस कर सकते हैं।
- इससे गलतफहमियां बढ़ने लगती हैं।
- इमोशनल बातें मैसेज के जरिए सही से नहीं पहुंच पाती हैं।
- ऑफिस में कम्युनिकेशन गैप बनता है।
- टीमवर्क और प्रोफेशनल ग्रोथ प्रभावित होती है।
- बॉस या क्लाइंट गलत इंप्रेशन बना सकते हैं।
- धीरे-धीरे आत्मविश्वास भी कम हो जाता है।
सवाल- युवा फोन कॉल से ज्यादा मैसेज और चैट पर बात करना पसंद करते हैं? क्या ये भी एक तरह का टेलिफोबिया ही है?
जवाब- मैसेज पसंद करने वाला हर व्यक्ति टेलिफोबिक नहीं होता है।
- कई लोग अपनी सुविधा के लिए मैसेज करना चुनते हैं।
- मैसेज में ज्यादा कंट्रोल और सेफ्टी महसूस होती है।
- इसमें जवाब देने से पहले सोचने का समय मिल जाता है।
- कॉल में तुरंत प्रतिक्रिया देनी पड़ती है।
यह टेलिफोबिया है या नहीं, इसे समझने के लिए कॉल आने पर उभरे इमोशंस और उस समय शख्स का व्यवहार, दोनों को देखना जरूरी है।
सवाल- टेलिफोबिया को कैसे कंट्रोल किया जा सकता है?
जवाब- इसमें सबसे जरूरी ये है कि आप धीरे-धीरे कॉल की आदत डालें। अगर टेलिफोबिया बहुत एडवांस लेवल पर नहीं है तो खुद की कोशिश से ही सुधार हो सकता है।

सवाल- क्या प्रोफेशनल हेल्प से टेलिफोबिया में मदद मिलती है? प्रोफेशनल हेल्प लेना कब जरूरी है?
जवाब- हां, एंग्जाइटी और किसी भी तरह की मेंटल हेल्थ कंडीशन में प्रोफेशनल हेल्प सबसे सही रास्ता होता है।
- कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT) से डर कम हो सकता है।
- हम अपने नेगेटिव थॉट्स की वजह समझ पाते हैं।
- एक्सपोजर थेरेपी से कॉल का डर धीरे-धीरे कम होता है।
प्रोफेशनल हेल्प कब जरूरी
- जब टेलिफोबिया से नौकरी प्रभावित होने लगे।
- डेली लाइफ के काम प्रभावित होने लगें।
- जब रिश्तों में दूरी आने लगे।
- जब एंग्जाइटी के स्पष्ट लक्षण दिखने लगें।
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