कमाल है देवर-भाभी की कजरौटा होली, विंध्य में आज भी चकाचक निभाई जा रही गुदगुदाने वाली रस्म

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Holi News: मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में होली त्योहार विशेष परंपराओं के साथ मनाया जाता है. यहां देवर-भाभी की कजरौटा होली खास पहचान रखती है, जहां स्नेह और हंसी-ठिठोली के बीच रिश्तों की मिठास और सामाजिक एकता का संदेश दिया जाता है. इस रस्में बेहद कमाल हैं. जानें…

Sidhi News: भारत में होली अलग-अलग रंगों और परंपराओं के साथ मनाई जाती है. उत्तर प्रदेश में लट्ठमार और लड्डू होली की धूम रहती है, तो मध्य प्रदेश के विंध्य अंचल में देवर-भाभी की कजरौटा होली चर्चा में रहती है. यहां होली को फगुआ कहा जाता है. यह सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, भाईचारे और सामाजिक एकता का प्रतीक है. लोग पुराने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को रंग लगाते हैं. इसकी सबसे खास पहचान भाभी-देवर के स्नेहिल रिश्ते से जुड़ी अनोखी परंपरा की है.

फगुआ की शुरुआत होते ही गांवों में नगरिया, ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम की थाप पर पारंपरिक गीत गूंजने लगते हैं. घर-आंगन रंग और गुलाल से भर उठते हैं. हंसी-ठिठोली के बीच एक खास रस्म निभाई जाती है. भाभी अपने देवर को काजल लगाती है और रंग-बिरंगे बताशा खिलाती है. 75 वर्षी संतोष मिश्रा ने लोकल 18 को बताया, काजल लगाना बुरी नजर से बचाने और शुभकामनाओं का संकेत है. जब भाभी देवर की आंखों पर काजल लगाती है, तो वह उसके सुख, समृद्धि और लंबी उम्र की कामना करती है. इसे संरक्षण और स्नेह का भाव माना जाता है. वहीं रंग-बिरंगे बताशा खिलाना रिश्ते में मिठास बनाए रखने का संदेश है. यह छोटी-सी रस्म देवर-भाभी के पवित्र रिश्ते को उजागर करती है.

रिश्तों की मर्यादा कायम 
संतोष मिश्रा ने आगे बताया, फगुआ के दिन देवर-भाभी के बीच चुटीले गीत गाए जाते हैं. मजाक होता है, लेकिन मर्यादा और सम्मान हमेशा कायम रहता है. यही संतुलन इस रिश्ते को खास बनाता है. लोकगीतों में भी इस रिश्ते की झलक मिलती है, जो उत्सव को और रंगीन बना देती है. साहित्यकार नंदकुमार मिश्रा ने बताया, ऐसे लोक उत्सव परिवार और समाज को एकजुट रखने में अहम भूमिका निभाते हैं. फगुआ के दौरान लोग पुराने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाते हैं। यह त्योहार नई शुरुआत और आपसी सौहार्द का प्रतीक बन जाता है.

उत्साह से निभा रहे परंपरा
बदलते दौर और शहरीकरण के बावजूद विंध्य अंचल में यह परंपरा आज भी पूरे उत्साह से निभाई जा रही है. नई पीढ़ी भी इसे गर्व के साथ आगे बढ़ा रही है. काजल और बताशे की यह रस्म बताती है कि त्योहार केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि रिश्तों की मजबूती का उत्सव है. विंध्य में फगुआ के रंगों के साथ भाभी-देवर का स्नेहिल रिश्ता आज भी संस्कृति की अनमोल पहचान बना हुआ है.

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Rishi mishra

एक दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय. प्रिंट मीडिया से शुरुआत. साल 2023 से न्यूज 18 हिंदी के साथ डिजिटल सफर की शुरुआत. न्यूज 18 के पहले दैनिक जागरण, अमर उजाला में रिपोर्टिंग और डेस्क पर कार्य का अनुभव. म…और पढ़ें

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