Dacoit Ganpat Rao Story: यह बात करीब ढाई सौ साल पुरानी है. जब उस समय न तो हवाई जहाज था, न मोटर कार. तब घोड़ा गाड़ी, बग्गी ही लोगों के आवागमन का प्रमुख साधन था. यह भी किसी राज परिवार या जमींदारों के पास ही उपलब्ध थे. ज्यादातर लोग पैदल या बैलगाड़ी से ही सफर करते थे. लोगों का यह सफर उस वक्त डर में बदल जाता था, जब विंध्याचल के घने जंगल से लोग गुजरते थे. क्योंकि, यहां गणपत राव नाम के एक डाकू ओर उसके साथियों का खौफ रहता था, जो राहगीरों को लुट लेते थे.
व्यापारियों और राहगीरों को लूटता था
डकैत गणपत राव ने घने जंगल और ऊंचे पहाड़ का फायदा उठाया. पहाड़ी के मुहाने को अपना ठिकाना बनाया. रात के अंधेरे में जो भी व्यापारी या राहगीर यहां से गुजरता उसे लूट लिया जाता. देखते ही देखते डाकुओं का आतंक हर तरफ फैलने लगा. लोग दिन में भी इस रास्ते से गुजरने से डरते थे, लेकिन फिर एक दिन उसकी मुलाकात देवी अहिल्या बाई होलकर से हुई. उनके न्याय और सादगी ने उसकी जिंदगी ही बदल दी.
बदल गई गणपत की जिंदगी
इतिहासकार दुर्गेश कुमार राजदीप बताते हैं कि गणपत राव का नाम सुनते ही राहगीर डर जाते थे. वह जंगल और पहाड़ियों का पूरा फायदा उठाकर व्यापारियों और यात्रियों को लूट लिया करता था. डाकुओं के डर से लोग दिन में भी रास्ता पार करने में हिचकिचाते थे. अकेले तो बिलकुल नहीं जाते थे. ऐसा माना जाता है कि अहिल्या बाई से मिलने के बाद डकैत गणपत राव की जिंदगी पूरी तरह बदल गई.
अहिल्या बाई से प्रभावित
जब गणपत राव की मुलाकात देवी अहिल्या बाई होलकर से हुई. उनकी न्यायप्रियता, जनता के प्रति उनके लगाव और अपने राज्य के लिए किए गए कार्यों से गणपत काफी प्रभावित हुआ. उसने महसूस किया कि अपनी ताकत का इस्तेमाल लोगों के भले के लिए किया जाना चाहिए. इसके बाद गणपत राव ने अपने अपराध छोड़ दिए मेहनत करने का मन बनाया और लूटा हुआ पूरा धन, संपत्ति अहिल्या बाई को राज्य के विकास के लिए सौंप दिया.
234 साल पहले हुआ निर्माण
दुर्गेश राजदीप ने बताया कि गणपत राव के धन और अहिल्या बाई के सहयोग से साल 1791 में जाम दरवाजा (किला) बनवाया गया. इसका निर्माण राज्य की सुरक्षा और मार्ग पर निगरानी एवं व्यवस्थित आवागमन सुनिश्चित करने के लिए किया गया. इस जिले का निर्माण पहाड़ी के सबसे ऊंचे मुहाने पर किया गया, जहां से निमाड़ ओर मालवा दोनों पर निगरानी रखी जा सके. साथ ही उन्होंने मार्ग को भी दूरस्थ किया, जिससे आवागमन आसान हुआ.
31 फीट ऊंचा है जाम दरवाजा
पहले जहां यह मार्ग घने जंगलों और ऊंची पहाड़ियों से होकर गुजरता था और खौफनाक माना जाता था. आज वही मार्ग अहिल्या बाई होलकर और गणपत राव की बदौलत पर्यटकों के लिए सबसे सुविधा जनक बन गया है. अब यह जगह जाम गेट के नाम से प्रसिद्ध है, जो मध्य प्रदेश का बड़ा पिकनिक स्पॉट बन चुका है. 31 फीट ऊंचे किले से नीचे फैली निमाड़ और मालवा की सुंदरता को निहारने हजारों सैलानी आते हैं. जब उन्हें यहां का इतिहास पता चलता है, तो गर्व से अहिल्या बाई होलकर और गणपत राव का नाम लेते हैं.
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