वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिकी सेना जिस तरह उनके कमरे से खींचकर ले गई, उसने दुनियाभर को सकते में डाल दिया है. अमेरिका की इस कार्रवाई के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप वहां जमीनी जंग और सैन्य कब्जे की ओर बढ़ रहे हैं. खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन अटकलों को खारिज करते हुए साफ कहा है कि अमेरिका वेनेजुएला के साथ किसी युद्ध में नहीं है. ट्रंप के मुताबिक, अमेरिका की लड़ाई वेनेजुएला या उसके लोगों से नहीं, बल्कि ड्रग तस्करों, अपराधियों और उन ताकतों से है जो अमेरिका को नुकसान पहुंचा रही हैं.
ट्रंप के लिए कैसे मुश्किल चना साबित होगा वेनेजुएला?
विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रेटर कैरेबियन क्षेत्र में तैनात अमेरिकी सैन्य ताकत इतनी नहीं है कि वह वेनेजुएला जैसे बड़े, पहाड़ी और जटिल भूगोल वाले देश पर कब्जा कर सके. राजधानी काराकास और उसके विशाल जनसंख्या वाले इलाकों को नियंत्रित करना तो और भी मुश्किल है. इतिहास बताता है कि 1989 में छोटे से पनामा पर हमले के लिए भी अमेरिका को 30 हजार से ज्यादा सैनिक उतारने पड़े थे. ऐसे में वेनेजुएला पर पूर्ण कब्जा आसान नहीं है. यही वजह है कि सैन्य ठिकानों पर बमबारी और हमलों को असल ऑपरेशन से ध्यान भटकाने वाला कदम माना जा रहा है.
सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, वेनेजुएला की सेना खुले युद्ध में कमजोर हो सकती है, लेकिन प्रतिरोध में खतरनाक साबित होगी. जंगलों और पहाड़ों का फायदा उठाकर ‘गुरिल्ला वॉर’ की रणनीति अपनाई जा सकती है, जहां स्थानीय मिलिशिया छिपकर हमले करेगी. ऐसे में तेल के कुओं और औद्योगिक इलाकों को जंगलों में छिपी इस मिलिशिया से बचाना मुश्किल होगा. ऐसे में अमेरिका को हवाई हमलों से फायदा मिल सकता है, लेकिन जमीनी कब्जे के लिए जंगलों और पहाड़ों से भरे विशाल क्षेत्र को नियंत्रित करना पड़ेगा, जो मुश्किल होगा.
अफगानिस्तान जैसा हमला क्यों पड़ेगा भारी?
वेनेजुएला और अफगानिस्तान के भूगोल को देखें तो दोनों में काफी समानताएं हैं. दोनों में पहाड़ और कठिन इलाके हैं, जो आक्रमणकारी सेनाओं के लिए मुश्किल साबित होते हैं. वेनेजुएला के जंगल अफगानिस्तान के पहाड़ों की तरह गुरिल्ला युद्ध के लिए उपयुक्त हैं, जहां छिपना आसान है. अफगानिस्तान का इतिहास दिखाता है कि कैसे पहाड़ी इलाके दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाओं को हरा सकते हैं. अमेरिका ने वर्ष 2001 में अफगानिस्तान पर धावा बोलकर तालिबान को सत्ता हटा दिया था. लेकिन 20 साल के युद्ध में ट्रिलियन डॉलर खर्च और हजारों मौतों के बाद 2021 में उसे पीछे हटना पड़ा और अब वहां एक बार फिर से तालिबान ही काबिज है.
फिर अमेरिका का असल मकसद क्या?
विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका का असली लक्ष्य देश पर कब्जा करना नहीं, बल्कि वेनेजुएला की राजनीतिक नेतृत्व संरचना को तोड़ना और सेना के भीतर गहरी फूट पैदा करना था. यह वही रणनीति है, जिसे अमेरिका और स्थानीय विपक्ष पिछले 20 सालों से आजमाता रहा है, लेकिन अब तक नाकाम रहा है. वेनेजुएला में अमेरिका समर्थित कोई मजबूत स्थानीय सैन्य या जनआधारित ताकत नहीं है, जो सत्ता परिवर्तन को ‘वैध विद्रोह’ का रूप दे सके. यही सबसे बड़ी कमजोरी मानी जा रही है.
इसी कारण ट्रंप की ओर से आगे और हमलों की धमकी दी जा रही है. जानकारों का कहना है कि अगर राजनीतिक और कूटनीतिक दबाव काम नहीं करता, तो अमेरिका सैन्य दबाव बढ़ा सकता है. लेकिन यह रास्ता बेहद खतरनाक है. अफगानिस्तान और इराक जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि सैन्य ताकत के बल पर सरकारें गिराई जा सकती हैं, लेकिन किसी देश को लंबे समय तक नियंत्रित करना लगभग असंभव हो जाता है.
वेनेजुएला में कैसे हैं हालात?
एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि मादुरो को पकड़ लेने के बावजूद अमेरिका फिलहाल खेल नहीं जीत पाया है. वेनेजुएला की राजधानी काराकास और देश के ज्यादातर हिस्सों पर अब भी सरकारी और वफादार बलों का नियंत्रण बना हुआ है. कहीं बड़े पैमाने पर विद्रोह, सैन्य बगावत या दंगे देखने को नहीं मिले हैं. हालात तनावपूर्ण जरूर हैं, लेकिन अपेक्षाकृत शांति बनी हुई है. लोगों की चिंता ज्यादा तर रोजमर्रा की जरूरतों, खासकर खाद्य आपूर्ति को लेकर है.
इस पूरी स्थिति से यह भी साफ होता है कि अमेरिका के पास फिलहाल वेनेजुएला के लिए कोई मजबूत वैकल्पिक नेतृत्व नहीं है. यही वजह है कि डोनाल्ड ट्रंप ने विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो को भी सत्ता सौंपने योग्य नहीं माना और खुद काम संभालने की बात कही. जानकारों का मानना है कि अगला कदम तेल कुओं और ऊर्जा ढांचे पर नियंत्रण की कोशिश हो सकता है, ताकि ऑपरेशन को आर्थिक रूप से चलाया जा सके. लेकिन यह रणनीति भी लैटिन अमेरिका में भारी विरोध और अस्थिरता को जन्म दे सकती है.
विश्लेषकों का कहना है कि यह पूरी कार्रवाई लोकतंत्र, मानवाधिकार या ड्रग्स के खिलाफ लड़ाई से ज्यादा कच्चे तेल और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण से जुड़ी है. अगर अमेरिका ने वेनेजुएला में अफगानिस्तान जैसी गलती दोहराई, तो उसे लंबे समय तक राजनीतिक, सैन्य और कूटनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है. यही वजह है कि मादुरो को पकड़ लेना भले ही बड़ी कामयाबी दिखे, लेकिन सेना भेजकर वेनेजुएला पर कब्जा करना डोनाल्ड ट्रंप के लिए बेहद भारी पड़ सकता है.
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