143 मिलियन लोग और 30 अरब तस्वीरें. जब लोग फोन लेकर पार्क में पिकाचू ढूंढ रहे थे, तब वे जानते नहीं थे कि असल में तो वो दुनिया की सबसे बड़ी एआई मैपिंग कंपनी (AI Mapping Company) के लिए मुफ्त में काम कर रहे थे. उन्हें लग रहा था कि वे गेम खेल रहे हैं, लेकिन सच तो ये है कि कंपनी उनके साथ खेल रही थी. याद कीजिए 2016 के उस पागलपन को, जब हर दूसरा इंसान हाथ में मोबाइल लिए सड़कों पर बदहवास घूम रहा था. किसी को लगा यह बस एक गेम है, किसी ने इसे वक्त की बर्बादी कहा, लेकिन सैन फ्रांसिस्को में अपने ऑफिस में बैठे जॉन हांके मुस्कुरा रहे थे. सर्वर क्रैश होने की कगार पर था, लेकिन जॉन के लिए यह परेशानी नहीं, बल्कि इस बात का सुबूत था कि उनका सबसे बड़ा दांव सही बैठ गया है. वो दांव था दुनियाभर के लोगों के हाथों में मौजूद कैमरे का कंट्रोल अपने हाथ में लेना और बिना एक भी पैसा दिए दुनिया का सबसे बड़ा AI मैप बनवाना.
पिछले 8 सालों में, पोकेमोन गो (Pokemon GO) के खिलाड़ियों ने अनजाने में अपनी फोन स्क्रीन के जरिए दुनिया के चप्पे-चप्पे को स्कैन कर डाला है. आज नियान्टिक (Niantic) के पास जो 30 अरब तस्वीरों का डेटाबेस है, उसने इसे गूगल मैप्स से भी ज्यादा ताकतवर बना दिया है.
जॉन हांके (John Hanke) कोई नौसिखिए नहीं थे. वो वही शख्स हैं, जिन्होंने कीहोल (Keyhole) नाम की कंपनी बनाई थी, जिसे बाद में गूगल ने खरीद लिया और वही आगे चलकर गूगल अर्थ कहलाया. जॉन ने आसमान से तो पूरी दुनिया को नाप लिया था, लेकिन उनके दिमाग में एक उलझन थी. सैटेलाइट से ली गई तस्वीरें ऊपर से तो सब कुछ दिखाती थीं, लेकिन गली के नुक्कड़, पार्क की बेंच और किसी ऐतिहासिक इमारत की सीढ़ियों का असली 3डी एहसास वो नहीं दे सकती थीं. जॉन को पता था कि भविष्य की तकनीक ऑगमेंटेड रियलिटी (AR) को एक ऐसे मैप की जरूरत होगी, जो सड़क के लेवल से दुनिया को देख समझ सके. लेकिन पूरी दुनिया की हर गली, हर चौराहे को स्कैन करना किसी एक कंपनी के बस की बात नहीं थी, चाहे वो गूगल ही क्यों न हो.
लेकिन जॉन का विजन बहुत अलग था. उन्हें ऐसा करने के लिए करोड़ों कैमरों की जरूरत थी. उनकी कंपनी नियान्टिक ने पोकेमोन गो से पहले ‘इंग्रेस’ नाम का एक गेम लॉन्च किया था. इस गेम में खिलाड़ियों को अपने शहर की खास जगहों पर जाकर डिजिटल कब्जे करने होते थे. इंग्रेस खेलने वाले कुछ लाख दीवानों ने अनजाने में दुनियाभर की लाखों जगहों का पहला डेटाबेस तैयार कर दिया. लेकिन जॉन हांके को लाखों नहीं, करोड़ों लोग चाहिए थे.
किस्मत का खेल देखिए, 2014 में ‘अप्रैल फूल’ के दिन गूगल मैप्स ने एक मजाक किया था. उन्होंने अपने मैप पर पोकेमोन छिपा दिए और लोगों से उन्हें ढूंढने को कहा. यह इतना हिट हुआ कि जॉन हांके के दिमाग की बत्ती जल गई. उन्होंने तुरंत जापानी कंपनी निनटेंडो से हाथ मिलाया और जन्म हुआ पोकेमोन गो का. शुरुआती दौर में यह एक बहुत बड़ा रिस्क था. अगर यह गेम फ्लॉप होता, तो कंपनी रातों-रात दिवालिया हो जाती. लेकिन जुलाई 2016 में जब गेम आया तो इसने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. लोग पार्कों में, मंदिरों के बाहर, ऑफिस के पार्किंग लॉट में फोन लेकर घूमने लगे.
खेलने वालों को दिया रिवार्ड का लालच
शुरुआत में यह सब बहुत मजेदार लग रहा था. लोग वजन घटाने और बाहर निकलने के बहाने गेम खेल रहे थे. लेकिन जैसे-जैसे गेम आगे बढ़ा, नियान्टिक ने इसमें एआर मैपिंग (AR Mapping) के टास्क जोड़ दिए. खिलाड़ियों को लालच दिया गया कि अगर वो किसी स्थानीय लैंडमार्क या दुकान के चारों तरफ घूमकर 30 सेकंड का वीडियो बनाएंगे, तो उन्हें गेम में खास रिवॉर्ड मिलेंगे. यह एक मास्टरस्ट्रोक था. जो काम करने के लिए टेक कंपनियों को अरबों डॉलर खर्च करने पड़ते, वो काम गेम के दीवाने फैंस ने मजे-मजे में कर दिया. 2021 में Series D फंडिंग राउंड के समय कंपनी की वैल्यूएशन 9 अरब डॉलर के पार पहुंच गई थी.
बना दिया एकदम सटीक VPS
देखते ही देखते, 8 सालों के अंदर कंपनी के पास 30 अरब से ज्यादा तस्वीरें और स्कैन जमा हो गए. इस विशाल डेटा से कंपनी ने जो बनाया, उसे आज की टेक दुनिया में लार्ज जियोस्पेशियल मॉडल (LGM) कहा जाता है. इसे आप ऐसे समझें जैसे चैटजीपीटी शब्दों को समझता है, वैसे ही नियान्टिक का LGM असली दुनिया की जगहों को समझता है. यह सिस्टम इतना एडवांस है कि अगर आप अपने फोन का कैमरा ऑन करें, तो यह एक सेकंड में बता देगा कि आप दुनिया के किस कोने में, किस गली में, किस तरफ मुंह करके खड़े हैं.
नियान्टिक का बिजनेस मॉडल अब पूरी तरह बदल चुका है. उनके पास विजुअल पोजिशनिंग सिस्टम (VPS) है. आम जीपीएस (GPS) में 10 से 20 मीटर की चूक हो सकती है, लेकिन नियान्टिक का सिस्टम सेंटीमीटर की सटीकता से बता सकता है कि आप कहां खड़े हैं. यह डेटा अब सिर्फ गेमिंग के लिए नहीं, बल्कि खुद चलने वाली कारों (Self-driving cars) और रोबोटिक्स के लिए सोने की खान बन चुका है.
जब आया था कंपनी का बुरा दौर!
लेकिन यह सफर इतना आसान नहीं था. जैसे-जैसे नियान्टिक की वैल्यूएशन आसमान की तरफ बढ़ रही थी, वैसे-वैसे मुश्किलें भी बढ़ने लगीं. लोग पोकेमोन पकड़ने के चक्कर में रेलवे ट्रैक पर पहुंच जाते, किसी की प्राइवेट प्रॉपर्टी में घुस जाते या एक्सीडेंट का शिकार हो जाते. नियान्टिक पर कई देशों में मुकदमे हुए. फिर आया 2020 का वह मनहूस दौर (कोविड-19) जिसने पूरी दुनिया को घरों में कैद कर दिया. एक ऐसा गेम, जो लोगों को बाहर निकलने पर मजबूर करता था, वो रातों-रात बेकार लगने लगा. कंपनी का रेवेन्यू गिरा, इन्वेस्टर्स घबराने लगे. नियान्टिक को अपने कई बड़े प्रोजेक्ट बंद करने पड़े. उन्होंने हैरी पॉटर और मार्वल सुपरहीरोज पर आधारित गेम बनाए थे, जो बुरी तरह फ्लॉप हुए. कंपनी को अपने कई कर्मचारियों को नौकरी से निकालना पड़ा.
इस पूरे सफर में विवादों ने भी पीछा नहीं छोड़ा. कई देशों में प्राइवेसी को लेकर शोर मचा. सुरक्षा एजेंसियों ने चिंता जताई कि इस गेम के जरिए संवेदनशील इलाकों की थ्री-डी मैपिंग हो रही है. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. नियान्टिक ने एक ऐसा इकोसिस्टम बना लिया था, जिसे हिलाना मुश्किल था. उन्होंने साबित कर दिया कि अगर आप किसी काम को खेल बना दें, तो लोग उसे करने के लिए अपनी प्राइवेसी तक दांव पर लगा देते हैं. आज पिकाचू सिर्फ एक कार्टून नहीं है, वो एक ऐसे डिजिटल साम्राज्य का चेहरा है जिसने बिना किसी सैलरी के दुनिया की सबसे बड़ी जासूसी और मैपिंग सेना तैयार कर ली.
कंपनी के बारे में लेटेस्ट अपडेट्स क्या है?
फरवरी 2025 में खबर आई कि नियान्टिक ने अपना वीडियो गेम बिज़नेस Scopely को 3.5 बिलियन डॉलर में बेचने की बातचीत कर रहा है. फिर मार्च 2025 में यह डील कन्फर्म हुई और 29 मई 2025 को यह अधिग्रहण पूरा हो गया. ट्रूअप की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस डील के बाद अप्रैल 2025 में Niantic ने 68 कर्मचारियों की छंटनी भी की.
Niantic का गेम डेवलपमेंट बिज़नेस, जिसमें Pokemon Go जैसे गेम शामिल हैं, Scopely के पास चला गया, जबकि बाकी का नॉन-गेमिंग बिज़नेस चलाने के लिए Niantic Spatial के नाम से अलग कंपनी बन गई. नियान्टिक अब पूरी तरह से AR/spatial टेक्नोलॉजी पर फोकस कर रही है. Niantic Spatial की नई वैल्यूएशन अभी सार्वजनिक नहीं है.
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