जब लोग मोबाइल फोन का मतलब सिर्फ बात करना या मैसेज भेजना समझते थे, तब चीन के बीजिंग शहर में एक मिडिल क्लास परिवार का लड़का, लेई जुन, अपनी खुली आंखों में बड़े सपने लेकर घूम रहा था. उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा आएगा, जब यह लड़का दुनिया की सबसे बड़ी मोबाइल कंपनियों में से एक खड़ी कर देगा और एक ऐसी फैक्ट्री बनाएगा, जहां इंसान नहीं सिर्फ मशीनें काम करेंगी. कल्पना कीजिए एक ऐसी जगह की जहां पूरी तरह अंधेरा है, कोई लाइट नहीं जल रही, कोई शोर-शराबा नहीं है, लेकिन वहां हर सेकंड एक स्मार्टफोन बनकर तैयार हो रहा है. यह शाओमी की उस ‘डार्क फैक्ट्री’ की हकीकत है जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है.
लेई जुन कॉलेज के दिनों में कोडिंग के दीवाने थे. उन्होंने अपनी पढ़ाई के दौरान ही सॉफ्टवेयर बनाना शुरू कर दिया था. ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने किंगसॉफ्ट नाम की कंपनी में काम किया और अपनी मेहनत के दम पर वहां के सीईओ बन गए. लेकिन उनके अंदर का बिजनेसमैन उन्हें कुछ और करने के लिए उकसा रहा था. उन्होंने ‘जॉयो’ नाम की एक ई-कॉमर्स साइट बनाई और उसे बाद में अमेजन को बेच दिया. इस सौदे से उनके पास काफी पैसा आ गया था, वो चाहते तो आराम की जिंदगी जी सकते थे, लेकिन उनके दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था. उन्हें लग रहा था कि मोबाइल की दुनिया में कुछ ऐसा किया जा सकता है जो अभी तक किसी ने नहीं किया.
बाजरे का दलिया खाकर शुरू की कंपनी
साल 2010 में बीजिंग के एक छोटे से ऑफिस में लेई जुन ने अपने 7 साथियों के साथ मिलकर शाओमी की शुरुआत की. उस दिन उन सबने मिलकर ‘मिलेट पॉरिज’ यानी बाजरे का दलिया खाया था, जिसे चीन में ‘शाओमी’ कहा जाता है. इसी नाम से कंपनी का जन्म हुआ. शुरुआत में उनके पास अपना फोन बनाने के लिए फैक्ट्री नहीं थी, बस एक विजन था कि कम कीमत में बेहतरीन टेक्नोलॉजी. उन्होंने सबसे पहले अपना ऑपरेटिंग सिस्टम MIUI लॉन्च किया, जिसे लोगों ने खूब पसंद किया. जब उन्होंने अपना पहला फोन Mi 1 बाजार में उतारा तो लोग हैरान थे कि इतने कम दाम में कोई कंपनी इतने अच्छे फीचर्स कैसे दे सकती है.
हार्डवेयर पर केवल 5 प्रतिशत का मुनाफा
शाओमी का बिजनेस मॉडल बड़ा सीधा और अनोखा था. लेई जुन ने तय किया था कि वो अपने हार्डवेयर पर 5 परसेंट से ज्यादा मुनाफा नहीं कमाएंगे. वो चाहते थे कि उनका फोन हर आम आदमी के हाथ में हो. उन्होंने मार्केटिंग पर पैसा खर्च करने के बजाय फ्लैश सेल का सहारा लिया. इंटरनेट पर कुछ ही सेकंड में हजारों फोन बिक जाते थे. देखते ही देखते शाओमी सिर्फ चीन में ही नहीं, बल्कि भारत और यूरोप के बाजारों में भी छा गई. लोग इसे ‘चीन का ऐपल’ कहने लगे और लेई जुन को ‘चीन का स्टीव जॉब्स’. लेकिन लेई जुन का सपना सिर्फ फोन बेचने तक सीमित नहीं था, वो मैन्युफैक्चरिंग की दुनिया में एक क्रांति लाना चाहते थे.
शाओमी की हाई-टेक फैक्ट्री
तरक्की के इस रास्ते में कई मुश्किलें भी आईं. एक वक्त ऐसा आया जब शाओमी की सेल गिरने लगी और दूसरी चीनी कंपनियां उन्हें टक्कर देने लगीं. आलोचकों ने कहना शुरू कर दिया कि शाओमी का जादू अब खत्म हो गया है. लेकिन लेई जुन हार मानने वालों में से नहीं थे. उन्होंने अपनी पूरी सप्लाई चेन को बदला और ऑफलाइन मार्केट में भी अपनी पकड़ मजबूत की. इसी दौरान उन्होंने सोचा कि अगर उन्हें दुनिया का नंबर वन बनना है, तो उन्हें अपनी प्रोडक्शन की रफ्तार को उस लेवल पर ले जाना होगा, जहां कोई सोच भी न सके. यहीं से जन्म हुआ शाओमी की नई और हाई-टेक फैक्ट्री का.
डार्क फैक्ट्री के नाम से मशहूर
बीजिंग के चांगपिंग इलाके में शाओमी ने एक ऐसी फैक्ट्री बनाई है जो आज के दौर का अजूबा है. लगभग 97 हजार स्क्वायर यार्ड में फैली यह फैक्ट्री पूरी तरह से ऑटोमेटेड है. इसे ‘डार्क फैक्ट्री’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहां काम करने के लिए रोशनी की जरूरत ही नहीं पड़ती. मशीनों को अंधेरे में भी सब दिखता है. यहां आपको कोई वर्कर इधर-उधर भागता हुआ नहीं दिखेगा. रोबोटिक हाथ बड़ी ही नजाकत और तेजी से फोन के पुर्जे जोड़ते हैं. एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यह तय करता है कि हर फोन एकदम परफेक्ट बने. अगर किसी फोन में बाल बराबर भी कमी रह जाती है, तो स्मार्ट कैमरे उसे तुरंत पकड़ लेते हैं.
हर साल 1 करोड़ स्मार्टफोन
इस फैक्ट्री की ताकत का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि यह साल में 1 करोड़ स्मार्टफोन बना सकती है. यानी हर सेकंड में एक फोन. जो काम करने में इंसानों को घंटों लगते थे और जिसमें गलती की गुंजाइश रहती थी, वो काम अब ये मशीनें बिना थके, बिना रुके 24 घंटे करती हैं. यहां का लॉजिस्टिक सिस्टम भी पूरी तरह ऑटोमेटिक है, यानी सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए भी किसी इंसान की जरूरत नहीं पड़ती. यह सब शाओमी के अपने प्लेटफॉर्म ‘हाइपर आईएमपी’ से कंट्रोल होता है.
आज शाओमी सिर्फ एक मोबाइल कंपनी नहीं रह गई है. यह दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों में शामिल है जो टीवी, लैपटॉप, एयर प्यूरीफायर और अब इलेक्ट्रिक कारें भी बना रही है. लेई जुन ने एक छोटे से ऑफिस से जो सफर शुरू किया था, वो आज एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गया है जहां टेक्नोलॉजी और इंसान का रिश्ता बदल गया है.
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