Last Updated:
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में पुरुषों में अकेलापन एक साइलेंट किलर की तरह उभर रहा है. अक्सर अपनी भावनाओं को दबाने वाले पुरुष कब गहरे अकेलेपन (Loneliness) का शिकार हो जाते हैं, इसका अंदाजा उनके करीबी लोगों को भी नहीं हो पाता. एक शोध के अनुसार, महिलाओं की तुलना में पुरुष अपने मन की बात कम साझा करते हैं, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक साबित हो रहा है.’मेल लोनलीनेस’ की जड़ें सामाजिक ढाँचे और पुरानी सोच में छिपी हैं. पुरुषों को यह सिखाना जरूरी है कि मदद मांगना या अपनी भावनाएं व्यक्त करना कमजोरी नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती की निशानी है.
आज के दौर में पुरुषों का अकेलापन एक ‘साइलेंट महामारी’ जैसा हो गया है. इसकी सबसे बड़ी वजह वो पुरानी सोच है जो लड़कों को बचपन से ही “मजबूत” बनने और “आंसू छिपाने” का बोझ थमा देती है. ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ जैसे जुमलों ने पुरुषों से उनका यह हक ही छीन लिया कि वे कभी कमजोर महसूस कर सकें या किसी के कंधे पर सिर रखकर रो सकें.

रही-सही कसर इस डिजिटल लाइफ ने पूरी कर दी है—हाथ में मोबाइल तो है, पर दिल का हाल सुनने वाला कोई सच्चा दोस्त नहीं. करियर की भागदौड़, ‘सक्सेसफुल’ दिखने का प्रेशर और एक ऐसे ‘सेफ स्पेस’ की कमी जहाँ उन्हें जज न किया जाए, आज के भारतीय पुरुषों को भीड़ में भी अकेला बना रही है.

पुरुषों में अकेलेपन को कैसे पहचानें? पुरुष अक्सर अपने अकेलेपन को उदासी के बजाय अन्य व्यवहारों में छिपाते हैं. इसे पहचानने के कुछ प्रमुख लक्षण यहाँ दिए गए हैं. पहला है अत्यधिक काम में डूबे रहना (Workaholism). जब कोई पुरुष घर के खालीपन या मन की बेचैनी से बचने के लिए जरूरत से ज्यादा काम करने लगे, तो यह अकेलेपन का संकेत हो सकता है.
Add News18 as
Preferred Source on Google

दूसरा लक्षण है चिड़चिड़ापन और गुस्सा: अकेलापन पुरुषों में हमेशा दुख के रूप में नहीं दिखता. कई बार यह बेवजह के गुस्से, झुंझलाहट या छोटी बातों पर रिएक्ट करने के रूप में बाहर आता है. जबकि तीसरा लक्षण है सोशल विड्रॉल (सामाजिक दूरी). दोस्तों के साथ बाहर जाने से कतराना, फोन कॉल न उठाना और अकेले वक्त बिताने की आदत बढ़ जाना.

इसके अलावा नींद और भूख में बदलाव भी इसके लक्षण है. एकाएक वह बहुत अधिक सोने की कोशिश करने लगते हैं या बिल्कुल नींद ही नही आती है और खान-पान के प्रति लापरवाही बरतने लगते हैं. अकेलेपन के दर्द को कम करने के लिए शराब या अन्य नशीले पदार्थों का सहारा लेने लगते हैं.

मर्दों को क्यों चाहिए अपना एक ‘सेफ स्पेस’? मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि हर पुरुष को एक ऐसे ‘सेफ स्पेस’ की जरूरत होती है जहाँ उसे ‘जज’ (Judge) न किया जाए. इसके पीछे कई कारण हैं. पहला है इमोशनल वेंटिलेशन. समाज ने पुरुषों को सिखाया है कि “मर्द को दर्द नहीं होता” या “रोना कमजोरी है.” एक सेफ स्पेस उन्हें इस मुखौटे को उतारने और अपनी कमजोरियों को स्वीकार करने की आजादी देता है.

घर, करियर और रिश्तों की जिम्मेदारियों के बीच पुरुष अक्सर खुद को भूल जाते हैं. एक ‘बॉयज गैंग’ या कोई हॉबी ग्रुप उनके लिए वह जगह होती है जहाँ वे बिना किसी जिम्मेदारी के तनाव मुक्त हो सकते हैं. इसके अलावा, जब पुरुषों को अपनी बात कहने के लिए एक सुरक्षित मंच मिलता है, तो उनका तनाव स्तर कम होता है और उनमें आत्मविश्वास बढ़ता है.

अकेलेपन को कैसे रोकें? ‘मेल लोनलीनेस’ की जड़ें सामाजिक ढाँचे और पुरानी सोच में छिपी हैं. पुरुषों को यह सिखाना जरूरी है कि मदद मांगना या अपनी भावनाएं व्यक्त करना कमजोरी नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती की निशानी है.अगर आप या आपके आसपास कोई पुरुष इस स्थिति से गुजर रहा है, तो ये कदम मददगार हो सकते हैं. कम्युनिकेशन (संवाद): अपने पुराने दोस्तों से जुड़ें. जरूरी नहीं कि आप अपनी समस्याएं ही बताएं, बस सामान्य बातचीत भी मन हल्का कर सकती है.

हॉबी विकसित करें: खेल, जिम, पेंटिंग या संगीत जैसी गतिविधियों में शामिल हों. यह न केवल आपको व्यस्त रखता है बल्कि समान विचारधारा वाले लोगों से मिलने का मौका भी देता है. सामाजिक बंधनों को तोड़ें: यह स्वीकार करने में कोई बुराई नहीं है कि आप अकेला महसूस कर रहे हैं. अपनी भावनाओं को व्यक्त करना कमजोरी नहीं, बल्कि बहादुरी है.

प्रोफेशनल मदद लें: अगर अकेलापन डिप्रेशन का रूप ले रहा हो, तो थेरेपिस्ट या काउंसलर से बात करने में संकोच न करें. पुरुषों का अकेलापन केवल एक व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि एक सामाजिक मुद्दा है. हमें एक ऐसा माहौल बनाना होगा जहाँ पुरुष अपनी भावनाओं को साझा करने में शर्म महसूस न करें.
.