क्यों खास है पहाड़ों की यह किचन ट्रिक? ठंडी सब्जी भी बनती है गर्म तासीर वाली

Last Updated:

उत्तराखंड की पहाड़ी रसोई सिर्फ स्वाद का नहीं, बल्कि परंपरा और स्वास्थ्य ज्ञान का अनमोल खजाना है. यहां पीढ़ियों से ऐसे घरेलू पाक तरीक़े अपनाए जाते रहे हैं, जो शरीर को मौसम के अनुसार ढालते हैं और भोजन को सुपाच्य बनाते हैं. ठंडी तासीर वाली सब्जियों में भांग के दानों का पानी मिलाने की यह परंपरा इसी लोक-ज्ञान का हिस्सा है, जो स्वाद बढ़ाने के साथ-साथ पाचन को भी दुरुस्त रखती है.

उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों में रसोई सिर्फ खाना बनाने की जगह नहीं, बल्कि परंपरा और स्वास्थ्य ज्ञान का केंद्र रही है. यहां पीढ़ियों से कई ऐसे घरेलू तरीके अपनाए जाते आए हैं, जो स्वाद के साथ सेहत का भी ध्यान रखते हैं. इन्हीं में से एक है ठंडी तासीर वाली सब्जियों की गर्माहट बढ़ाने का तरीका. गडेरी, कचालू, गेठी और कोलोकासिया जैसी सब्जियां पकाते समय भांग के दानों का पानी मिलाया जाता है. यह प्रक्रिया न केवल स्वाद को संतुलित करती है, बल्कि पाचन तंत्र को भी दुरुस्त रखती है. यह ज्ञान लोक अनुभव पर आधारित है.

What is cannabis and where is it available?

भांग कुमाऊं में पाया जाने वाला एक पारंपरिक मसाला बीज है. इसके दाने छोटे, कठोर और हल्की कड़वाहट व गर्म तासीर वाले होते हैं. पहाड़ों के जंगलों और खेतों के आसपास इसकी झाड़ियां स्वाभाविक रूप से उगती हैं. ग्रामीण परिवार इसे सुखाकर सालभर के लिए संरक्षित कर लेते हैं. भांग का उपयोग केवल ठंडी सब्जियों में ही नहीं, बल्कि कभी-कभी दालों और विशेष व्यंजनों में भी किया जाता है. यह मसाला स्थानीय बाजारों में बहुत कम मात्रा में मिलता है, इसलिए यह पहाड़ी रसोई की पहचान से सीधे जुड़ा हुआ स्वाद और उपचारात्मक तत्व माना जाता है.

Why are there problems with cold vegetables?

गडेरी (अरबी), कचालू और कोलोकासिया जैसी सब्जियों की तासीर स्वभावतः ठंडी मानी जाती है. अगर इन्हें सही तरीके से पकाया न जाए तो खाने के बाद पेट में भारीपन, गैस, जलन या शरीर में खुजली जैसी समस्याएं हो सकती हैं. कुछ लोगों में इन सब्जियों का असर एलर्जी जैसा भी लग सकता है. पहाड़ों में इन समस्याओं को अच्छी तरह समझा गया है. इसलिए पीढ़ियों से इन्हें पकाने का तरीका अलग चला आ रहा है, जिसमें तासीर संतुलित करने के लिए भांग के उबले पानी या चुने के पानी जैसी प्राकृतिक विधियों का सहारा लिया जाता है, जिससे सब्जी सुपाच्य बनती है.

How to prepare the extract of the part

भांग का पानी तैयार करने की प्रक्रिया बहुत सरल है. सबसे पहले भांग के कुछ दानों को साफ कर लें और फिर उन्हें तवे पर भून लें. भुने हुए दानों को सिलबट्टे या मिक्सी में बारीक पीस लें. इसके बाद इस पेस्ट में पानी मिलाएं और छन्नी से छानकर उसका पानी अलग कर लें. सब्जी में यही छना हुआ पानी डालें और 10 से 15 मिनट तक पकने दें. ध्यान रखें कि सब्जी में सीधे दाने नहीं, सिर्फ छना हुआ पानी ही मिलाना है. इस तरह पकाई गई सब्जी न सिर्फ स्वादिष्ट बनती है, बल्कि पचने में आसान और शरीर के अनुकूल हो जाती है, साथ ही इसकी तासीर भी गर्म हो जाती है.

Slight change in taste

जब भांग का अर्क किसी सब्जी में मिलाया जाता है, तो उसके स्वाद में हल्का बदलाव आ जाता है. सब्जी में सामान्य तीखापन और गर्माहट का अहसास बढ़ने लगता है, जिससे स्वाद साधारण से विशेष हो जाता है. गडेरी या कचालू जैसी सब्जियां अक्सर चटपटे और मसालेदार रूप में पकाई जाती हैं, और भांग का अर्क इस खट्टे-तीखे स्वाद को संतुलित करता है. कई ग्रामीण परिवार इसे पहाड़ी दही या चैंस (छाछ) के साथ मिलाकर खाते हैं, जिससे इसका स्वाद और भी लजीज हो जाता है. यही अनोखा स्वाद पहाड़ी भोजन को मैदानों की रसोई से अलग पहचान देता है.

How beneficial from a health perspective

भांग के दानों में शरीर को गर्म रखने वाले तत्व होते हैं। यह मसाला पाचन क्रिया को सक्रिय करता है और पेट में बनने वाली गैस को रोकने में मदद करता है. ठंड के मौसम में यह शरीर के तापमान को संतुलित रखने में सहायक माना जाता है. विशेष रूप से बुजुर्ग और कमजोर पाचन वाले लोगों के लिए यह तरीका बेहद लाभकारी है. यही कारण है कि पहाड़ों की रसोई में भांग केवल स्वाद बढ़ाने वाला मसाला नहीं, बल्कि एक घरेलू औषधीय तत्व की तरह माना जाता है. यह पारंपरिक उपचार आज भी फायदेमंद साबित होता है.

This tradition continues in the villages even today.

बाजार में चाहे कितने भी नए मसाले और पैक मसाला मिक्स उपलब्ध हो गए हों, लेकिन पहाड़ों के ग्रामीण घरों में आज भी भांग का इस्तेमाल भरोसे और अनुभव के साथ किया जाता है. पहाड़ी महिलाएं रसोई की इस विरासत को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ा रही हैं. गांवों में त्योहारों, दावतों और रोजमर्रा के भोजन में गडेरी की सब्जी अभी भी इसी तरीके से पकाई जाती है. इसके पीछे भोजन को केवल स्वाद की वस्तु नहीं, बल्कि शरीर को मौसम और स्थान के अनुरूप ढालने की वैज्ञानिक समझ भी जुड़ी है, जिसे स्थानीय लोग बखूबी समझते हैं.

How useful in modern life

आज के समय में लोग हेल्दी और नेचुरल कुकिंग की ओर लौट रहे हैं. ऐसे में पहाड़ की यह परंपरागत पाक तकनीक और भी प्रासंगिक हो गई है. जो लोग गडेरी या ठंडी तासीर वाली सब्जियां खाने से परेशानी महसूस करते हैं, वे इस तरीके को अपनाकर आसानी से लाभ पा सकते हैं. यह तरीका बेहद सरल है और किसी भी क्षेत्र में रहने वाले लोग इसे अपने किचन में इस्तेमाल कर सकते हैं. इससे खाना स्वादिष्ट भी बनता है और शरीर को बिना परेशानी के पच भी जाता है. पहाड़ी भोजन की यही सादगी और वैज्ञानिकता इसे विशेष बनाती है.

न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें।
homelifestyle

क्यों खास है पहाड़ों की यह किचन ट्रिक? ठंडी सब्जी भी बनती है गर्म तासीर वाली

Share me..

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *