रामायण के सुंदरकांड का किस्सा है। हनुमान जी माता सीता की खोज में समुद्र लांघकर लंका जा रहे थे। ये यात्रा केवल शारीरिक नहीं थी, बल्कि मानसिक, आत्मिक और कर्तव्यनिष्ठा की भी परीक्षा थी। समुद्र के ऊपर उड़ते हुए हनुमान जी पूरे ध्यान और संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे थे। उनका लक्ष्य स्पष्ट था- सीता माता का पता लगाना और श्रीराम के कार्य को पूरा करना। उसी समय समुद्र के बीच से एक स्वर्णिम पर्वत प्रकट हुआ। यह पर्वत था मैनाक। मैनाक हनुमान जी की शक्ति और सेवा भाव से प्रसन्न था। मैनाक पर्वत ने विनम्रता से हनुमान जी से कहा कि हे पवनपुत्र, आप बहुत दूर की यात्रा कर रहे हैं। कुछ देर मेरे ऊपर विश्राम कर लीजिए, ताकि आपकी थकान दूर हो जाए। हनुमान जी ने पर्वत की बात सुनी, उसे ध्यान से देखा और मुस्कराते हुए उसका स्पर्श किया। उन्होंने आदरपूर्वक कहा कि आपका यह प्रेम और सम्मान मेरे लिए अत्यंत मूल्यवान है। आपने मुझे विश्राम करने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं, लेकिन इस समय रुकना मेरे लिए सही नहीं है। जब तक मेरा लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता, तब तक मुझे विश्राम नहीं करना है। मैनाक ने फिर कहा कि लंका अभी काफी दूर है, विश्राम करने से आपकी शक्ति और बढ़ जाएगी। हनुमान जी बोले कि अभी मेरे भीतर उत्साह और ऊर्जा भरी हुई है। यदि मैं अभी विश्राम करूंगा, तो कहीं आलस न आ जाए। आलस लक्ष्य से भटका देता है। हनुमान जी समझ चुके थे कि यह स्वर्ण पर्वत केवल विश्राम का नहीं, बल्कि आकर्षण का भी प्रतीक है। सोने का पर्वत भोग-विलास, सुख-सुविधा और आराम का संकेत था। यदि वे यहां रुक जाते, तो संभव था कि लक्ष्य से ध्यान हट जाता। इसलिए उन्होंने मैनाक को नमन किया और बिना रुके आगे बढ़ गए। यह प्रसंग हमें सीख देता है कि सफलता उसी को मिलती है, जो सम्मानपूर्वक अवसरों को स्वीकार करता है, लेकिन लक्ष्य की बीच आने वाले आकर्षणों में नहीं फंसता है। प्रसंग की सीख हनुमान जी और मैनाक पर्वत का यह किस्सा हमें सीख देता है कि करियर, व्यापार, पढ़ाई, स्वास्थ्य या आत्मविकास के रास्ते में मैनाक पर्वत जैसे कई आकर्षण आ जाते हैं, हमें ऐसी चीजों से बचना चाहिए। हनुमान जी को पता था कि उन्हें क्या करना है। जब लक्ष्य स्पष्ट होता है, तब कोई भी आकर्षण हमें रोक नहीं सकता। जीवन में भी अगर उद्देश्य साफ नहीं है, तो हर सुविधा हमें भटका सकती है। आज के समय में मोबाइल, कार, टीवी, सोशल मीडिया, ये सभी साधन हैं, लक्ष्य नहीं। इन्हें इस्तेमाल करें, लेकिन इन्हीं में उलझ न जाएं। साधन वही ठीक है जो लक्ष्य तक पहुंचाए। हर स्थिति में अपने लक्ष्य पर ध्यान लगाए रहना चाहिए। जब हम ऊर्जा और उत्साह से भरे होते हैं, तभी अक्सर मन कहता है कि थोड़ा आराम कर लेते हैं। यही सोच कई बार हमारी गति को रोक देती है और हम लक्ष्य से भटक जाते हैं। हनुमान जी में शक्ति-सामर्थ्य की कमी नहीं थी, लेकिन उन्होंने अनुशासन नहीं छोड़ा। जीवन में टैलेंट से ज्यादा जरूरी है निरंतरता और अनुशासन। इन दोनों गुणों से ही सफलता मिलती है। हनुमान जी ने मैनाक का अपमान नहीं किया। उन्होंने धन्यवाद दिया, स्पर्श किया और आगे बढ़ गए। हमें भी अपने आसपास के लोगों, अवसरों और सुविधाओं का सम्मान करना चाहिए, अपने निर्णय पर भी टिके रहना चाहिए। आलस हमेशा थकान के रूप में नहीं आता, कभी-कभी यह आराम का लालच बनकर भी आता है। इसे पहचानना जरूरी है, आलस की वजह से हमारा लक्ष्य दूर हो जाता है। मैनाक पर्वत शत्रु नहीं था, बल्कि परीक्षा था। वैसे ही जीवन में मिलने वाली कई सुख-सुविधाएं हमें परखने आती हैं कि हम लक्ष्य के प्रति कितने गंभीर हैं। हनुमान जी जानते थे कि समय सीमित है। अगर वे रुक जाते, तो श्रीराम के कार्य में देरी होती। हमारे जीवन में भी समय का सही उपयोग ही सफलता दिलाता है। .