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Slow Parenting Benefits:सुबह स्कूल, दोपहर में ट्यूशन और शाम को कोई न कोई एक्स्ट्रा करिकुलर क्लास जैसे गिटार, कराटे या कोडिंग. मां-बाप को लगता है कि अगर बच्चा एक खाली पल भी बैठा है, तो वह पिछड़ जाएगा. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस ‘टाइट शेड्यूल’ का बच्चे के मानसिक विकास पर क्या असर पड़ रहा है? यहीं से जन्म होता है ‘स्लो पेरेंटिंग’ (Slow Parenting) के कॉन्सेप्ट का, जो आज के दौर की बड़ी जरूरत है.
Slow Parenting Benefits: स्लो पेरेंटिंग का मतलब यह नहीं है कि आप अपने बच्चे को आलसी बना दें या उसे कुछ न सिखाएं. इसका सीधा सा मतलब है-बच्चे को उसकी अपनी रफ्तार से जीने देना. हर वक्त उसे किसी न किसी एक्टिविटी में उलझाए रखने के बजाय, उसे थोड़ा खाली वक्त देना. यह एक ऐसी सोच है जो कहती है कि बच्चे का बचपन कैलेंडर की तारीखों और घड़ी की सुइयों से नहीं, बल्कि उसकी अपनी पसंद और खोज (Discovery) से चलना चाहिए.
अक्सर जब बच्चा कहता है कि “मम्मी, मैं बोर हो रहा हूं,” तो हम घबरा जाते हैं. हमें लगता है कि हमें तुरंत उसे कोई खिलौना देना चाहिए या टीवी चला देना चाहिए. लेकिन मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चे का ‘बोर’ होना उसकी सेहत और दिमाग के लिए एक वरदान है. जब बच्चा बोर होता है, तभी उसका दिमाग नए-नए रास्ते खोजता है. वह खुद को व्यस्त रखने के लिए कल्पना करता है, नई कहानियां बुनता है और घर की पुरानी चीजों से ही कुछ नया बनाने की कोशिश करता है.
बोरियत दरअसल ‘क्रिएटिविटी’ (Creativity) की जननी है. जब आप बच्चे को बोर होने देते हैं, तो वह ‘सेल्फ-रिलायंस’ यानी आत्मनिर्भरता सीखता है. उसे समझ आता है कि अपनी खुशी के लिए उसे हमेशा किसी गैजेट या किसी बाहरी क्लास की जरूरत नहीं है. खाली वक्त में वह तितलियों के पीछे भाग सकता है, मिट्टी में खेल सकता है या बस छत पर लेटकर बादलों के आकार देख सकता है. यही वो पल हैं जहां उसकी कल्पना शक्ति (Imagination) सबसे तेज काम करती है.
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आजकल के बच्चे ‘बर्नआउट’ का शिकार हो रहे हैं. 8-10 साल की उम्र में ही उनमें स्ट्रेस और एंग्जायटी दिखने लगी है. इसका कारण है हर वक्त ‘परफॉर्म’ करने का दबाव. क्लास में टॉप करना, ट्यूशन में अच्छा करना और फिर स्पोर्ट्स में मेडल लाना. स्लो पेरेंटिंग इस दबाव को कम करती है. यह बच्चे को बताती है कि सिर्फ ‘कुछ करना’ ही उपलब्धि नहीं है, बल्कि ‘बस होना’ (Just Being) भी उतना ही जरूरी और खूबसूरत है.
हमें यह समझना होगा कि हर बच्चा अलग होता है. किसी को पेंटिंग पसंद है तो किसी को बस शांत बैठना. जबरदस्ती की क्लासेस बच्चे की नेचुरल टैलेंट को दबा सकती हैं. स्लो पेरेंटिंग हमें मौका देती है कि हम रुकें और देखें कि हमारे बच्चे का असल झुकाव किस तरफ है. जब बच्चा अपनी मर्जी से कुछ चुनता है, तो वह उसमें ज्यादा खुश रहता है और बेहतर नतीजे देता है.
अंत में, याद रखिए कि बचपन दोबारा नहीं आता. बच्चों को परफेक्ट बनाने के चक्कर में हम उनका वह सुनहरा समय छीन रहे हैं जिसे वे बाद में याद करेंगे. इसलिए, अगली बार जब आपका बच्चा कहे कि वह बोर हो रहा है, तो परेशान न हों. उसे मुस्कुराकर कहें-“बहुत अच्छी बात है, देखो तुम खुद क्या नया कर सकते हो!”
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