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Mauni Amavasya 2026: धार्मिक ग्रंथों में अमावस्या पर सूर्यदेव की आराधना को बेहद फलदायी माना गया है. मान्यता है कि इस पावन तिथि पर सूर्य पूजन से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है, जिसका फल लंबे समय तक जीवन में बना रहता है.
उज्जैन. हिंदू पंचांग के अनुसार पूरे साल में कुल 12 अमावस्याएं आती हैं लेकिन इनमें मौनी अमावस्या का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है. यह तिथि माघ मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि को पड़ती है. शास्त्रों में अमावस्या को पितरों की उपासना और स्मरण का दिन बताया गया है. प्राचीन काल से ही इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने, दान-पुण्य करने और पितरों के निमित्त तर्पण करने की परंपरा चली आ रही है. मान्यता है कि मौनी अमावस्या पर श्रद्धापूर्वक तर्पण करने से पूर्वज संतुष्ट होते हैं और परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखते हैं. इससे पितृ दोष का प्रभाव कम होता है और घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वातावरण बना रहता है. ऐसे में लोगों के मन में यह जानने की उत्सुकता होगी कि साल की पहली अमावस्या यानी माघ अमावस्या इस साल कब और किस दिन पड़ेगी. उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य आनंद भारद्वाज से जानते हैं माघ अमावस्या की सही तिथि, वार और इससे जुड़े महत्वपूर्ण नियम.
वैदिक पंचांग के अनुसार, माघ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि 18 जनवरी को रात 12 बजकर 03 मिनट से शुरू होगी और तिथि का समापन 19 जनवरी को रात 01 बजकर 21 मिनट पर होगा. उदयातिथि के आधार पर मौनी अमावस्या 18 जनवरी 2026 दिन रविवार को होगी.
अमावस्या पर सूर्यदेव का विशेष महत्व
धार्मिक ग्रंथों में अमावस्या के दिन सूर्यदेव की आराधना को अत्यंत फलदायी बताया गया है. मान्यता है कि इस पावन तिथि पर सूर्य पूजा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है, जिसका फल लंबे समय तक जीवन में बना रहता है. माघ अमावस्या की सुबह सूर्यदेव को अर्घ्य देकर दिन की शुरुआत करने से शारीरिक रोग, ग्रह दोष और नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव कम होता है.
पितरों को प्रसन्न करने के लिए जरूर करें ये काम
माघ अमावस्या के दिन सुबह जल्दी उठकर सबसे पहले स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं, फिर पितरों का स्मरण कर तर्पण दें. तर्पण के लिए काले तिल, सफेद फूल और कुश का इस्तेमाल होता है. तर्पण से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है. इस दिन पितरों को प्रसन्न करने के लिए पितृ चालीसा का पाठ करना काफी शुभ होता है, साथ ही पितरों की आत्मा की शांति के लिए ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें. इस दिन स्नान के बाद पीपल वृक्ष की जड़ में जल देना चाहिए. इससे भी पितृ दोष दूर होता है. इस दिन पीपल की पूजा करें, 7 बार परिक्रमा करें और सरसों तेल में काले तिल डालकर दीप जलाएं. मान्यता है कि पीपल में पितृ भी वास करते हैं, इसलिए पीपल वृक्ष में जल देने और पीपल की सेवा करने से तीर्थ समान फल मिलता है और पितृ भी प्रसन्न होते हैं.
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राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.
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