क्या है अनार जैसा दिखने वाला ये जंगली फल, जो सिर्फ पहाड़ों पर मौजूद? जानें खासियत

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पहाड़ी दाड़िम के फायदे: हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला एक जंगली फल कई समस्याओं में कारगर होता है. इसे लंबे समय से अपने खानपान और घरेलू उपचार का हिस्सा बनाते आए हैं. यह प्राकृतिक रूप से उगने वाला पौधा है, जिसे ज्यादा देखभाल की जरूरत नहीं होती है. इसकी लोकप्रियता अब धीरे-धीरे पहाड़ों से बाहर भी बढ़ने लगी है.

उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में एक खास तरह का जंगली फल पाया जाता है, जिसे पहाड़ी दाड़िम कहा जाता है. यह देखने में अनार जैसा लगता है, लेकिन आकार में छोटा और स्वाद में हल्का खट्टा-मीठा होता है. यह फल मुख्य रूप से बागेश्वर, पिथौरागढ़ और आसपास के मध्य हिमालयी इलाकों में अधिक मिलता है. स्थानीय जानकार रमेश पर्वतीय ने बताया कि इसे लंबे समय से अपने खानपान और घरेलू उपचार का हिस्सा बनाते आए हैं. यह प्राकृतिक रूप से उगने वाला पौधा है, जिसे ज्यादा देखभाल की जरूरत नहीं होती है. इसकी लोकप्रियता अब धीरे-धीरे पहाड़ों से बाहर भी बढ़ने लगी है.

पहाड़ी दाड़िम ठंडे और शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में अच्छी तरह पनपता है. यह समुद्र तल से लगभग 900 से 1800 मीटर की ऊंचाई पर प्राकृतिक रूप से उगता है. मैदानी इलाकों की गर्म और आर्द्र जलवायु इसके विकास के लिए अनुकूल नहीं मानी जाती है. पहाड़ों की पथरीली जमीन, कम तापमान और साफ वातावरण इसे बढ़ने के लिए बेहतर परिस्थितियां देते हैं. यही वजह है कि यह फल मुख्य रूप से उत्तराखंड और हिमालयी पट्टी तक ही सीमित है. स्थानीय लोग इसे प्रकृति का उपहार मानते हैं.

दाड़िम का पौधा झाड़ी या छोटे पेड़ के रूप में विकसित होता है, जिसकी ऊंचाई सामान्यतः 2 से 4 मीटर तक होती है. इसकी टहनियां पतली और कभी-कभी कांटेदार भी होती हैं. पत्तियां छोटी, हरी और चमकदार होती हैं, जो इसे घना रूप देती हैं. इसका फल गोल और लाल या हल्का गुलाबी रंग का होता है, जो आकार में साधारण अनार से छोटा दिखता है. अंदर के दाने भी छोटे होते हैं, लेकिन स्वाद में काफी तीखे और खट्टे-मीठे होते हैं. फूल भी आकर्षक लाल रंग के होते हैं, जो पहाड़ी ढलानों की सुंदरता बढ़ाते हैं.

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डॉ. ऐजल पटेल ने लोकल 18 को बताया कि पहाड़ी दाड़िम को सेहत के लिहाज से बेहद फायदेमंद माना जाता है. इसमें विटामिन-सी, आयरन, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में मदद करता है. नियमित सेवन से पाचन तंत्र बेहतर रहता है, पेट से जुड़ी कई समस्याओं में राहत मिल सकती है. ग्रामीण इलाकों में लोग इसे प्राकृतिक टॉनिक की तरह इस्तेमाल करते हैं. खासकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए इसे लाभकारी माना जाता है. दाड़िम को स्वास्थ्यवर्धक फल के रूप में महत्व दिया गया है.

पहाड़ी क्षेत्रों में दाड़िम का उपयोग कई पारंपरिक घरेलू नुस्खों में किया जाता है. इसके रस को शहद के साथ मिलाकर बच्चों के पेट दर्द और अपच की समस्या में दिया जाता है. माना जाता है कि यह मिश्रण पाचन सुधारने और कमजोरी दूर करने में मदद करता है. इसके सूखे छिलकों का चूर्ण भी कई बार औषधीय प्रयोग में लाया जाता है. ग्रामीण महिलाएं इसे सर्दी-खांसी या हल्की पेट की परेशानी में भी उपयोग करती हैं. फिर भी पहाड़ों में यह फल प्राकृतिक दवा की तरह लोकप्रिय है.

पहाड़ी दाड़िम का स्वाद खट्टा-मीठा होने के कारण यह स्थानीय व्यंजनों में खूब इस्तेमाल किया जाता है. ग्रामीण इलाकों में इसे सिलबट्टे पर पीसकर स्वादिष्ट चटनी बनाई जाती है, जो भोजन का स्वाद कई गुना बढ़ा देती है. इसके अलावा उत्तराखंड की प्रसिद्ध तीखी चटनी “चुख” बनाने में भी इसका उपयोग होता है. यह चटनी लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सकती है. पहाड़ी भोजन की पहचान मानी जाती है. त्योहारों और खास मौकों पर भी इसे बनाया जाता है. दाड़िम से बनी चटनी अब पर्यटन के कारण बाहरी लोगों के बीच भी लोकप्रिय होने लगी है.

दाड़िम के छिलकों का उपयोग सिर्फ खाने तक सीमित नहीं है. पहाड़ों में लंबे समय से इसके सूखे छिलकों से प्राकृतिक रंग तैयार करने की परंपरा चली आ रही है. पुराने समय में ऊनी कपड़ों और पारंपरिक वस्त्रों को रंगने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता था. यह रंग पर्यावरण के लिए सुरक्षित और टिकाऊ माना जाता है. आज भी कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक हस्तशिल्प में इसका प्रयोग देखने को मिलता है. इससे स्थानीय लोगों को अतिरिक्त आय का साधन भी मिलता है.

पहाड़ी दाड़िम अब सिर्फ एक जंगली फल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बनता जा रहा है. ट्रेकिंग और पर्यटन के दौरान आने वाले लोग इसे चखने और खरीदने में रुचि दिखाते हैं. स्थानीय बाजारों में इससे बने उत्पाद जैसे चटनी, चुख और सूखे दाने बिकते हैं. इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती है. सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं इसके संरक्षण और व्यावसायिक खेती की संभावनाओं पर भी काम कर रही हैं. अगर सही तरीके से प्रचार और प्रसार किया जाए. तो यह ग्रामीण आजीविका का अच्छा साधन बन सकता है.

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