नींद की गोलियों में ऐसा क्या होता है, जिससे लग जाती है लत? स्लीपिंग पिल्स से जुड़ी ये 5 बातें कर देंगी हैरान

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Sleeping Pills and Addiction: लंबे समय तक नींद की गोलियां लेने से एडिक्शन हो जाता है और फिर इन दवाओं के बिना नींद नहीं आती है. दरअसल ये पिल्स ब्रेन केमिस्ट्री में बदलाव करती हैं और GABA न्यूरोट्रांसमिटर का असर बढ़ा देती हैं. इससे दिमाग शांत हो जाता है और नींद आ जाती है. हालांकि लंबे समय तक सेवन करने से शरीर में टॉलरेंस और डिपेंडेंस विकसित हो सकती है. इससे व्यक्ति को वही असर पाने के लिए ज्यादा डोज की जरूरत पड़ती है. इसलिए ये दवाएं डॉक्टर की सलाह पर ही लें.

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नींद की गोलियां ब्रेन की केमिस्ट्री बदलकर लत लगा देती हैं.

Truth About Sleeping Pill Addiction: नींद से जुड़ी समस्याएं आजकल तेजी से बढ़ रही हैं. भागदौड़ भरी जिंदगी, करियर का तनाव, पर्सनल लाइफ की परेशानियां, स्क्रीन का ज्यादा इस्तेमाल और गलत लाइफस्टाइल के कारण लोगों की नींद खराब हो रही है. कई लोग अनिद्रा का शिकार हो रहे हैं और रातभर बिस्तर पर करवटें बदलते रहते हैं. जब परेशानी ज्यादा बढ़ जाती है, तब कई लोग राहत पाने के लिए नींद की गोलियों का सहारा लेते हैं. शुरुआत में ये दवाएं असरदार लगती हैं, लेकिन लंबे समय तक स्लीपिंग पिल्स लेने से इनकी लत लग जाती है. डॉक्टर्स की सलाह के बिना ये दवाएं लेना खतरनाक है. अब सवाल यह है कि आखिर इन गोलियों में ऐसा क्या होता है, जो लोगों को इनका आदी बना देता है?

क्लीवलैंड क्लीनिक की रिपोर्ट के मुताबिक नींद के लिए प्रिस्क्राइब की जाने वाली स्लीपिंग पिल्स जैसे Benzodiazepines और Z-ड्रग्स ब्रेन में गामा-अमीनोब्यूट्रिक एसिड (GABA) नामक न्यूरोट्रांसमीटर की गतिविधि को बढ़ाती हैं. GABA एक केमिकल है, जो दिमाग की गतिविधि को शांत करता है और नींद लाने में मदद करता है. जब इन दवाओं के माध्यम से GABA का प्रभाव बढ़ाया जाता है, तो व्यक्ति को जल्दी नींद आती है. हालांकि लगातार उपयोग से ब्रेन इन दवाओं पर निर्भर होने लगता है और प्राकृतिक रूप से नींद लाने की क्षमता कम हो सकती है. इससे लोगों को इसकी ज्यादा डोज की जरूरत पड़ने लगती है.

नींद की गोलियों की लत लगने की प्रक्रिया को टॉलरेंस और डिपेंडेंस से समझा जा सकता है. टॉलरेंस का मतलब है कि समय के साथ शरीर को वही असर पाने के लिए ज्यादा डोज की जरूरत पड़ती है. जब व्यक्ति नियमित रूप से स्लीपिंग पिल्स लेता है, तो ब्रेन दवा के अनुसार खुद को ढाल लेता है. अगर अचानक दवा बंद कर दी जाए, तो अनिद्रा, घबराहट, चिड़चिड़ापन और कभी-कभी कंपकंपी जैसे लक्षण हो सकते हैं. यही शारीरिक और मानसिक निर्भरता की शुरुआत होती है. कुछ मामलों में यह स्थिति गंभीर रूप ले सकती है. इससे बचने के लिए नींद की दवाएं हमेशा डॉक्टर की निगरानी में लेनी चाहिए.

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इसके अलावा कुछ दवाएं जैसे Alprazolam एंजायटी और अनिद्रा दोनों में दी जाती हैं. ये दवाएं ब्रेन के रिवॉर्ड सिस्टम को भी प्रभावित कर सकती हैं. यह वही तंत्र है जो सुखद अनुभवों को दोहराने की प्रवृत्ति पैदा करता है. जब व्यक्ति दवा लेने के बाद राहत और आराम महसूस करता है, तो उसका दिमाग उस अनुभव को सकारात्मक रूप में याद रखता है. धीरे-धीरे व्यक्ति भावनात्मक तनाव या हल्की नींद की परेशानी में भी दवा लेने लगता है, जिससे मनोवैज्ञानिक लत विकसित हो सकती है.

एक्सपर्ट्स की मानें तो नींद की सभी दवाएं समान रूप से लत लगाने वाली नहीं होती हैं. उदाहरण के लिए Melatonin आधारित सप्लीमेंट्स आमतौर पर कम जोखिम वाले माने जाते हैं, क्योंकि वे शरीर में स्वाभाविक रूप से बनने वाले हार्मोन की नकल करते हैं. ये दवाएं ओवर द काउंटर मिल जाती हैं, लेकिन किसी भी दवा का लंबे समय तक उपयोग डॉक्टर की सलाह के बिना नहीं करना चाहिए. विश्व स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि स्लीपिंग पिल्स का उपयोग सीमित समय के लिए ही सुरक्षित है.

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अमित उपाध्याय

अमित उपाध्याय News18 Hindi की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें

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