मृत्यु से पहले ज्यादातर लोग इसके बारे में क्या जानना चाहते हैं और कैसे सवाल पूछते हैं

पांडव जब वनवास में समय गुजार रहे थे. तब पांडव भाई प्यास लगने पर एक सरोवर का पानी पीने गए. जिसका रक्षक एक यक्ष था. उसने सभी भाइयों से कहा कि वो पहले उसके सवालों का जवाब दें फिर पानी पिएं. किसी पांडव भाई ने ऐसा नहीं किया. बदले में जबरदस्ती पानी के दंड स्वरूप वो मरते रहे. फिर युधिष्ठिर पानी पीने आए. उन्होंने सवालों के जवाब देने शुरू किए. आखिरी सवाल था – जिंदगी का सबसे बड़ा सत्य क्या है. युधिष्ठिर ने जवाब दिया – मृत्यु. ये बात सही है हम सभी को एक दिन मृत्यु का सामना करना है.

मृत्यु के बारे में बात करना कठिन हो सकता है. कई लोग जब मृत्यु आती है तो खुद को तैयार नहीं पाते. पिछले दिनों “द न्यू यॉर्क टाइम्स” ने अपने पाठकों से मृत्यु और मरने के बारे में उनके सवाल पूछे. जो संपत्ति और अंतिम संस्कार की योजना, शोक प्रबंधन, अपने अंतिम दिनों पर नियंत्रण से संबंधित रहे.

इन्हीं में कुछ सवाल और न्यूयार्क टाइम्स द्वारा दिए गए जवाब यहां पेश है. बेशक इसे पढ़ते हुए आपको हमारे और उनके कल्चर और विचारों में कुछ अंतर लगे लेकिन स्थितियां एक जैसी ही हैं.

मृत्यु के चरण क्या हैं

जीवन के हर दूसरे हिस्से की तरह, हर व्यक्ति के अंतिम दिन अलग-अलग होते हैं. चिकित्सा विशेषज्ञ और हॉस्पिटल देखभाल कर्मी कुछ सामान्य पैटर्न बताते हैं.

मृत्यु से पहले के हफ़्तों में लोग अक्सर कम खाते-पीते हैं. ज़्यादा सोते हैं. कई लोग बेचैनी, बेचैनी या उलझन महसूस करते हैं. कुछ को तो मतिभ्रम होने लगता है. रक्तचाप, हृदय गति और अन्य महत्वपूर्ण संकेत अनियमित या धीमे हो जाते हैं. ये बदलाव मृत्यु से पहले के दिनों में और भी ज़्यादा स्पष्ट होने लग सकते हैं.

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उस समय लोगों को अक्सर निगलने में तकलीफ़ होती है. त्वचा पर नीले धब्बे पड़ जाते हैं या चेहरा लटक जाता है. सांस लेने की गति रुक-रुक कर हो सकती है – कभी तेज़ और उथली, फिर गहरी और तेज़..और कभी-कभी कुछ समय के लिए पूरी तरह से रुक भी सकती है. व्यक्ति का शरीर ठंडा हो सकता है, या बुखार से गर्म हो सकता है. चेतना कमजोर हो जाती है.

मृत्यु खड़खड़ाहट क्या है

“डेथ रैटल” एक ऐसी आवाज है जो अक्सर मरते हुए व्यक्ति के सांस लेने पर गले के पिछले हिस्से से आती है. एक अनुमान के अनुसार करीब 40 प्रतिशत रोगियों में ये कम से कम एक बार होता है. यह मृत्यु से कुछ घंटे या कुछ दिन पहले शुरू हो सकती है. इस समय, व्यक्ति को आमतौर पर निगलने और गला साफ करने में परेशानी होती है, इसलिए श्वास नलियों में बलगम और लार जमा हो जाता है. जब हवा इस जमाव के माध्यम से अंदर-बाहर होती है, तो यह खर्राटों, गुड़गुड़ाहट या खड़खड़ाहट जैसी आवाज कर सकती है. ऐसा भी लग सकता है कि व्यक्ति का दम घुट रहा है, हालांकि वास्तव में ऐसा नहीं होता है. डॉक्टरों का मानना है कि डेथ रैटल दर्दनाक या असुविधाजनक नहीं होता है – व्यक्ति को शायद पता ही नहीं होता कि यह हो रहा है. लेकिन इसे देखना कष्टदायक हो सकता है.

क्या मरता हुआ शख्स आसपास के लोगों की आवाज सुन सकता है

अस्पताल के केयर एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसा ही लगता है. कुछ प्रमाण हैं कि कोमा के मरीज़ अपने आस-पास की बातें सुन और समझ सकते हैं. 2020 के एक छोटे से अध्ययन में मृत्यु के करीब पहुंच चुके बेहोश मरीज़ों के मस्तिष्क की गतिविधियां दर्ज की गई. पाया गया कि वे ध्वनियों पर उसी तरह प्रतिक्रिया करते हैं जैसे युवा और स्वस्थ लोग करते हैं.

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क्या मुझे पता लगेगा कि मैं मर रहा हूं

शायद. शायद नहीं. कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे किसी व्यक्ति को सहज ही पता चल जाता है कि मौत आ रही है. जिन लोगों की हृदय गति रुकने के बाद उन्हें पुनर्जीवित किया गया, उनके साक्षात्कारों से पता चलता है कि इस घटना के दौरान उन्हें कुछ आभास हो गया था.

क्या मरने के पास का समय दर्दनाक होता है

ऐसा हो सकता है. क्लीवलैंड क्लिनिक के अनुसार, बहुत कुछ मृत्यु के कारण पर निर्भर करता है. इस बात पर भी कि निर्भर करता है कि मरने वाले व्यक्ति को दर्द कम करने के लिए दवा दी गई है या नहीं. अगर किसी व्यक्ति को कोई गंभीर चोट लगी है या वह बीमारी के अंतिम चरण से पीड़ा में है, तो ये पीड़ा आखिर समय तक जारी रह सकती है.

मृत्यु के निकट के अनुभव क्या हैं

अग्रणी शोधकर्ता डॉ. पीटर फेनविक का 2024 में निधन हो गया. उनकी 1995 में प्रकाशित पुस्तक “द ट्रुथ इन द लाइट” में 300 से ज़्यादा लोगों की यादें दर्ज हैं. आधे से ज़्यादा लोगों ने सुरंग में यात्रा करने की बात कही, जबकि लगभग तीन-चौथाई लोगों ने एक तेज़ रोशनी देखी या कहा कि उन्होंने धरती पर वापस आने का फ़ैसला कर लिया है.

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डेथ कैफे क्या है

डेथ कैफे एक ऐसा कार्यक्रम है जहां लोग मृत्यु और मरने के बारे में खुलकर बात करने के लिए इकट्ठा होते हैं. इसका उद्देश्य मृत्यु के बारे में जागरूकता बढ़ाना और लोगों को अपने जीवन का अधिकतम लाभ उठाने में मदद करना है. यह एक ऐसा स्थान है जहां लोग मृत्यु के बारे में अपने अनुभव साझा कर सकते हैं. मृत्यु को लेकर तमाम सवाल पूछते हैं. बिना किसी डर या निर्णय के चर्चा कर सकते हैं. यह मृत्यु को जीवन का एक सामान्य हिस्से के रूप में स्वीकार करने में मदद करता है.

मूल डेथ कैफ़े 2011 में लंदन में आयोजित किया गया था. तब से दुनियाभर में हज़ारों अन्य कैफ़े लोगों को एक साथ आने और मृत्यु का सामना करने के लिए अनोखा स्थान प्रदान कर चुके हैं – अक्सर नाश्ते के साथ. भारत में भी कहीं कहीं इस तरह से लोग मिल जुल रहे हैं और आपस में मृत्यु को लेकर खुलकर बात करते हैं. अपनी चिंताएं जाहिर करते हैं. सवाल करते हैं. जिज्ञासाएं हल करते हैं.

भारत में ऐसे मंच उभर रहे हैं जहां मृत्यु, मौत और मरने के बारे में जानकारी और चर्चा की जा सकती है. कुछ राज्यों में डेथ कैफ़े आयोजित किए जाते हैं, केरल में नियमित सत्र आयोजित किए जाते हैं.

ये दो घंटे की बैठकें होती हैं जिनमें 20 से ज़्यादा लोग नहीं होते. बातचीत का मार्गदर्शन करने के लिए एक सूत्रधार की मदद से, समूह के सभी सदस्यों को अपने विचार और चिंताएँ साझा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है.

आपके मरने के बाद शरीर का क्या होता है

मृत्यु के बाद मांसपेशियां और जोड़ अकड़ने लगते हैं. हालांकि ऐसा होने से पहले शरीर पूरी तरह से शिथिल हो जाता है. इससे त्वचा ढीली पड़ सकती है. अक्सर मूत्राशय और मलाशय से मल निकल जाता है. बहुत से लोग मरते समय खुद को गंदा कर लेते हैं. शरीर ठंडा हो जाता है. गुरुत्वाकर्षण द्वारा नीचे खींचा गया रक्त स्थिर होकर जमा हो जाता है, जिससे त्वचा पीली और धब्बेदार हो जाती है. कुछ घंटों के बाद मृत्यु की कठोरता शुरू हो जाती है. यह आमतौर पर कुछ दिनों तक रहता है. फिर शरीर फिर से शिथिल हो जाता है.

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