विवाह पंचमी आज, श्रीराम और सीता के 3 किस्से: रामायण की सीख: सुखी वैवाहिक जीवन के लिए पति-पत्नी एक-दूसरे के भाव समझें और अहंकार छोड़कर समर्पित रहें

  • Hindi News
  • Jeevan mantra
  • Dharm
  • Today Is Vivah Panchami, 3 Stories Of Shri Ram And Sita, Life Management Tips From Ramayana, Family Managemen Tips Of Lord Ram And Sita

4 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक

आज (25 नवंबर) विवाह पंचमी है। त्रेता युग में मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी पर भगवान राम और सीता का विवाह हुआ था। इस तिथि पर श्रीराम-सीता की पूजा करने के साथ ही रामायण का पाठ भी करना चाहिए। रामायण में कई ऐसे प्रसंग हैं, जहां श्रीराम-सीता ने सीख दी है कि सुखी वैवाहिक जीवन के लिए पति-पत्नी को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए…

1. वैवाहिक जीवन में विनम्रता बनाए रखें

जनकपुरी में माता सीता का स्वयंवर चल रहा था। राजा जनक ने घोषणा की थी कि जो व्यक्ति शिव जी के धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा, वही सीता का जीवन साथी बनेगा। अनेक राजकुमार और योद्धा स्वयंवर में आए थे। सभी ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया, लेकिन कोई धनुष को हिला तक न सके।

तभी ऋषि विश्वामित्र ने राम को आदेश दिया कि राम, तुम आगे बढ़ो और धनुष उठाओ। श्रीराम ने सबसे पहले अपने गुरु को नमन किया, फिर पूरे विनम्र भाव से शिव जी का ध्यान करते हुए धनुष को प्रणाम किया। इसके बाद उन्होंने सहजता से धनुष उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाने लगे तो देखते ही देखते धनुष टूट गया। इसके बाद श्रीराम और देवी सीता का विवाह हुआ।

प्रसंग की सीख

इस प्रसंग में धनुष अहंकार का प्रतीक है। अहंकार जब तक हमारे भीतर रहता है, हम किसी के साथ अपना जीवन नहीं बीता सकते। अहंकार को तोड़कर ही वैवाहिक जीवन में प्रवेश करना चाहिए। पति-पत्नी के बीच अहंकार होना ही नहीं चाहिए, विनम्रता से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।

2. समर्पण से मजबूत होता है वैवाहिक जीवन

जब श्रीराम को चौदह वर्षों का वनवास मिला, तब वे चाहते थे कि सीता अयोध्या में ही रहें, ताकि उन्हें वन के कठोर जीवन से बचाया जा सके। राम ने सीता को समझाया कि वन का जीवन कठिन होता है। वहां राक्षसों का भय है, जंगली जानवर, असहनीय गर्मी-ठंड, वर्षा, भूख-प्यास और अनगिनत कष्ट हैं।

एक राजकुमारी के लिए इन संघर्षों को सह पाना आसान नहीं था। मां कौशल्या भी चाहती थीं कि सीता अयोध्या में ही रहें, लेकिन सीता ने दृढ़ता से कहा कि प्रभु, आपकी संगति ही मेरा सबसे बड़ा सुख है। जहां आप हैं, वही मेरा घर है। सुख में ही नहीं, दुख में भी साथ निभाना मेरा धर्म है।

सीता ने राम और कौशल्या माता, दोनों को अपने प्रेम और समर्पण से मना लिया। अंततः वे श्रीराम के साथ वनवास के कठिन मार्ग पर चल दीं।

प्रसंग की सीख

सुखी वैवाहिक जीवन के लिए सबसे जरूरी है, पति-पत्नी का एक-दूसरे के प्रति समर्पण का भाव। समर्पण और निष्ठा पति-पत्नी को हर परिस्थिति में जोड़े रखती है, ऐसे ही भाव वैवाहिक जीवन में प्रेम को बनाए रखते हैं।

3. मन की बात समझना भी प्रेम है

वनवास में जब श्रीराम, लक्ष्मण और सीता को गंगा नदी पार करनी थी, उस समय उनकी मदद एक केवट ने की थी। केवट ने अपनी नाव से राम-सीता और लक्ष्मण को नदी पार उतारा था।

नदी पार कराने के बाद श्रीराम के पास केवट को देने के लिए कुछ भी नहीं था। वे कुछ कहने के लिए आगे बढ़े, लेकिन संकोच उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था। सीता ने ये भाव तुरंत पढ़ लिया। बिना कुछ कहे उन्होंने अपनी सोने की अंगूठी उतारी और केवट की ओर बढ़ाई, ताकि केवट को सम्मानपूर्वक दक्षिणा दी जा सके, लेकिन केवट ने मुस्कुराते हुए अंगूठी लेने से इंकार कर दिया और कहा कि प्रभु, जब आप लौटकर आएंगे, तब जो कृपा करेंगे, वहीं मेरे लिए प्रसाद होगा।

प्रसंग की सीख

ये प्रसंग हमें सीख देता है कि पति-पत्नी को केवल शब्दों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। एक-दूसरे की मन की बात, भावनाएं और संकोच को भी समझना चाहिए, यही सच्चा प्रेम है। जब साथी बिना कहे हमारी जरूरतों को पहचान ले, तो संबंध और भी मजबूत हो जाता है।

खबरें और भी हैं…

.

Share me..

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *