बीमारी नहीं, पीढ़ियों की आदत है हिंसा! ‘बुंदेली धरती का हिंडोला’ में दिखा कड़वा सच

Bundeli Dharti Ka Hindola: जिस तरह से हमें बीपी कम ज्यादा होने या शुगर जैसी बीमारी होती है तो पता चलता है कि यह बीमारी विरासत में ही चली आ रही है, ठीक इसी तरह महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा, अत्याचार भी जेनरेटिक मेमोरीज की तरह चले आ रहे है. जिसको बॉलीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता और रंग कर्मी गोविंद नामदेव ने अपने नाटक ‘बुंदेली धरती का हिंडोला’ से समाज के बीच लेकर आए हैं ताकि इस परंपरा को रोका जा सके, वह बताते हैं कैसे छोटी-छोटी हरकतें आदत बन जाती है और पता ही नहीं चलता, बुंदेलखंड में महिलाएं ऐसे अपना नसीब समझकर सहन करती रहती हैं जो समाज में कुरीति की तरह पैर पसारे हुए हैं. लेकिन इसको रोका भी जा सकता है

‘बुंदेली धरती का हिंडोला’ केवल एक नाटक नहीं, बल्कि समाज में रिश्तों, स्त्री सम्मान और सच्चे सुख की परिभाषा पर गंभीर संवाद है. यह प्रस्तुति बुंदेली रंगमंच की सशक्त पहचान बनकर लंबे समय तक स्मरणीय रहेगी. यह नाटक दर्शकों के मन में यह प्रश्न छोड़ जाता है कि क्या सच्चा सुख संपन्नता में है या संबंधों की आत्मीयता में. सागर और आसपास के युवा कलाकारों द्वारा बुंदेली बोली में प्रस्तुत यह नाट्य दर्शकों में गहरी छाप छोड़ रहा है.रंग थिएटर फोरम सागर, नेशनल स्कूल का ड्रामा नई दिल्ली और संस्कृति मंत्रालय मध्य प्रदेश की संयुक्त तत्वाधान में यह नाटक किया जा रहा है.

इनकी कहानी दो परिवारों के इर्द-गिर्द घूमती है. एक ओर गरीबी में भी प्रेम और आपसी समझ से जुड़ा भग्गो-घंसू का परिवार है तो दूसरी ओर संपन्नता के बावजूद बिखराव और हिंसा से ग्रस्त शकुंतला-सूरजभान का घर. यह विरोधाभास नाटक का मूल भाव बनकर उभरता है. सूरजभान का चरित्र घरेलू अत्याचार और पुरुषसत्ता का प्रतीक है, जबकि भग्गो का संघर्ष स्त्री की संवेदना, धैर्य और आत्मसम्मान को रेखांकित करता है. करीब 26 कलाकारों की सशक्त टोली ने नाटक को जीवंत बनाया. अन्य कलाकारों ने भी अपनी भूमिकाओं में प्रामाणिकता दिखाई.

महिलाओं पर अत्याचार जेनरेटिक मेमोरी में आ गया
इस नाटक को लेकर गोविंद नामदेव कहा कि जब में इसको लिख रहा था और जब उनकी कहानी पड़ी गहराई में गया तो इतने सालों का मेरा जो अनुभव है उसमें यह निकलकर सामने आया किया है जेनरेटिक मेमोरीज है जो हमारे फादर, फॉर फादर से चली जा रही है यह हमारी दिमाग में है हमारी नसों में है थोड़ा सा कुछ गलत देखा और हमारी नसे कहने लगती है कि इसको थप्पड़ मार दो, इसमें छोटी-छोटी बातें कभी बीवी सब्जी में नमक नहीं डाल पाई कभी उसके घर में आते ही पानी नहीं दे पाई तो आपने मारना पीटना शुरू कर दिया यह कौन सी बात होती है यही सब चीजों को देखा तो उस पर यह नाटक तैयार किया है.

हम देखते हैं कि कोई बड़ा भाई है तो वह किसी न किसी बात पर अपने छोटे भाई को या छोटी बहन को मारता रहता है और उसकी यही हरकत कब आदत बन जाती नहीं चलता हैं. जो कभी पत्नी पर तो कभी अपने मां-बाप पर हाथ उठाता है या गालियां देता रहता है, लेकिन उसके बाद छोटे छोटे बच्चों पर उसकी बीवी पर समाज पर इसका क्या असर होता है. वह क्या सोचते हैं, यह सब दिखाने का प्रयास किया गया है बुंदेली भाषा में लिखे गए इस नाटक को देखकर जहां लोगों की सच्चाई वास्ता होने पर आंखें नम होती है.

बुंदेली धरती का हिंडोला
इस नाटक का नाम बुंदेली धरती का हिंडोला दिया गया है. जिसका मेले में आने वाले हिंडोलना से हैं की महिलाओं के सामने जो परिस्थितियों 100 साल पहले थी वह आज भी हैं, वह सिलसिला चला आ रहा है पुरुषों के लिए पीटना और महिलाओं के लिए मार सहन करना, आदत बन गया है और वह इसके खिलाफ कभी आवाज नहीं उठाती है. लेकिन अब इसको रोकने का समय आ गया है.

47 साल से थिएटर कर रहे गोविंद नामदेव
47 साल से थिएटर कर रहे और 200 से अधिक फिल्में कर चुके अभिनेता गोविंद नामदेव ने 6 महीने इस नाटक को लिखा है. 35 दिन की एक वर्कशॉप कर नए कलाकारों को थिएटर की बारीकिया सिखाई और उसमें इस नाटक की प्रस्तुति तैयार की गई. इतना ही नहीं इसको करने के लिए गोविंद नामदेव ने जून के महीने में ही नवंबर और दिसंबर का समय सागर के लिए रिजर्व कर दिया था इन महीने में उन्होंने अपनी शूटिंग के लिए एक भी डेट किसी भी प्रोड्यूसर को नहीं दी थी उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड में जो यह कुरीति है, इस पर कठोरता से ब्रेक लगा चाहिए मैं अपने अंतिम समय में हूं और अपनी जन्मभूमि के लिए ऐसा कुछ करके लोगों के विचार बदलना चाहता हूं.

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