रीवाः अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय की स्थापना उस समय की गई जब विंध्य क्षेत्र शिक्षा में काफी पिछड़ रहा था. बढ़ती मांग के बीच विश्वविद्यालय स्थापित हुआ और क्षेत्र में शिक्षा का आधार स्थापित होने लगा. युवाओं को अपने यहां अच्छी शिक्षा मिलने लगी, जिससे उनके लिए रोजगार के द्वार खुलने लगे. बड़ी संख्या में युवाओं को हर साल अच्छी नौकरियां मिलने लगी जिससे वह अपने परिवार को संभालने में सक्षम हुए. पूरे अंचल की तरक्की की राह खुल गई.
नेहरू कहते थे मिस्टर यूनिवर्सिटी
इनके विचारों पर होती है शोध
इसके बाद कुलपति प्रो. हीरालाल निगम, प्रो. डीपी सिंह, प्रो. वीसी सिन्हा, प्रो. एडीएन वाजपेयी, प्रो. रहस्यमणि मिश्रा सहित कई ऐसे कुलपति आए जिन्होंने विश्वविद्यालय के विस्तार का काम किया. दूसरा दीक्षांत समारोह लंबे अंतराल के बाद वर्ष 2009 में और तीसरा वर्ष 2010 में हुआ. इसके बाद दीक्षांत समारोह भी नियमित होने लगे.
विश्वविद्यालय में सर्वधर्म समभाव की भावना को जागृत करने के लिए जहां एक ओर ‘जैन शोध पीठ’ की स्थापना की गई है, वहीं दूसरी ओर ‘गांधी और अम्बेडकर के विचारों’ पर भी शोध केन्द्र स्थापित हैं. बघेलखण्ड अपनी साहित्यिक सम्पदा के लिए भी जाना जाता है और बघेली को भाषा के रूप में स्थापित करने के लिए किए जा रहे प्रयासों में विश्वविद्यालय ने ‘बघेली पीठ’ स्थापित कर इसे ऊर्जा प्रदान की है. विश्वविद्यालय में नियमित भाषण मालाओं का आयोजन भी अलग पहचान बनाए हुए है.
आनंद विभाग भी किया स्थापित
जीवन से विलुप्त होते आनन्द की प्राप्ति के लिए आनन्द विभाग की विश्वविद्यालय में स्थापना एक ऐसा अभिनव प्रयोग है जो मनुष्य को बेहतर जीवन पद्धति तो सिखाएगा ही आपस में सौहार्द और सामंजस्य का संचार भी करेगा.
वर्तमान में इस विश्वविद्यालय में सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं. पुरुष और महिला छात्रावास भी संचालित हो रही हैं, जहां पर दो-तीन सौ छात्र छात्राएं रहते हैं. कई बार इस विश्वविद्यालय को विद्यार्थियों के विरोध का भी सामना करना पड़ता है. जिसका अधिकार विश्वविद्यालय प्रशासन अपने विद्यार्थियों को देता है. उनकी समस्याओं का समाधान भी किया जाता है.
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