चंदौली: आज जब आधुनिक खेती में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का अधिक उपयोग हो रहा है, जिससे मिट्टी की उर्वरता घट रही है और लोगों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ रहा है, ऐसे समय में चंद्र प्रकाश सिंह ने जैविक खेती की दिशा में एक मजबूत कदम उठाया है. अपने गांव में बायोगैस प्लांट के माध्यम से न केवल स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन किया, बल्कि उससे निकलने वाली स्लरी (गोबर से बनी तरल खाद) को जैविक खाद के रूप में उपयोग कर किसानों के लिए एक सस्ता, टिकाऊ और स्वास्थ्यवर्धक विकल्प भी प्रस्तुत किया है.
बायोगैस से दोहरा लाभ
चंद्र प्रकाश सिंह ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि उनके बायोगैस प्लांट का मुख्य उद्देश्य गैस उत्पादन था, लेकिन इसके साथ ही उन्हें एक और लाभ स्लरी के रूप में जैविक खाद मिला. यह स्लरी तब निकलती है, जब गोबर एनारोबिक (बिना ऑक्सीजन) प्रक्रिया में डाइजेस्ट होकर फर्मेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर में बदल जाता है. यह स्लरी सीधे खेतों में उपयोग की जा सकती है या इसे सुखाकर पाउडर के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे किसानों को रासायनिक खाद जैसे डीएपी और यूरिया पर निर्भरता कम करने में मदद मिल रही है.
बताते हैं कि आज के समय में रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी का कार्बन स्तर तेजी से गिर रहा है, जिससे उसकी उर्वरक क्षमता भी प्रभावित हो रही है. उन्होंने कहा कि बायोगैस स्लरी मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ाने में मदद करती है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है. इसके अलावा, यह खाद धीरे-धीरे पौधों को पोषण देती है, जिससे फसल की गुणवत्ता भी बेहतर होती है. इससे उगाई गई फसलें अधिक शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक होती हैं, जो सीधे तौर पर लोगों के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालती हैं.
खरपतवार नष्ट करने में सहायक
चंद्र प्रकाश ने बताया कि यदि किसान डीएपी जैसी रासायनिक खाद को पूरी तरह छोड़ना चाहते हैं, तो बायोगैस स्लरी में कुछ प्राकृतिक तत्व मिलाकर इसे प्रभावी विकल्प बनाया जा सकता है. उदाहरण के लिए, स्लरी में रॉक फॉस्फेट मिलाने से यह डीएपी का विकल्प बन सकती है. इसी तरह, यदि किसान कीटनाशकों का उपयोग कम करना चाहते हैं, तो स्लरी में नीम की खली या नीम का तेल मिलाकर इसे प्राकृतिक कीटनाशक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. यह फसल को कीटों से बचाने के साथ-साथ दीमक जैसी समस्याओं को भी नियंत्रित करता है.
वहीं, उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर किसान सीधे गोबर का उपयोग खेतों में करते हैं, लेकिन इससे एक बड़ी समस्या पैदा खरपतवार की होती है. गोबर में घास और खरपतवार के बीज मौजूद रहते हैं, जो खेतों में फैल जाते हैं और बाद में उन्हें नियंत्रित करने के लिए फिर से रासायनिक दवाओं का इस्तेमाल करना पड़ता है, लेकिन बायोगैस स्लरी या वर्मी कम्पोस्ट के साथ ऐसा नहीं होता, क्योंकि गोबर एनारोबिक प्रक्रिया में पूरी तरह डाइजेस्ट हो जाता है, जिससे उसमें मौजूद बीज नष्ट हो जाते हैं.
कम लागत, ज्यादा फायदा
चंद्र प्रकाश की इस पहल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह किसानों के लिए बेहद सस्ती है, जिन किसानों के पास पशु हैं, वे आसानी से गोबर का उपयोग करके बायोगैस और जैविक खाद दोनों तैयार कर सकते हैं. उन्होंने बताया कि उनके पास लगभग 200-250 गाय हैं, जिनसे पर्याप्त मात्रा में गोबर उपलब्ध हो जाता है. इस गोबर का उपयोग कर वे गैस, वर्मी कम्पोस्ट और स्लरी तैयार कर रहे हैं, जिससे उनकी खेती और उनके गांव की खेती पूरी तरह जैविक हो गई है.
आज के समय में लोग जिन बीमारियों से जूझ रहे हैं, उनका एक बड़ा कारण रासायनिक खाद और कीटनाशकों से उगाई गई फसलें हैं. चंद्र प्रकाश ने बताया कि यदि खेती में जैविक खाद का उपयोग बढ़ेगा, तो लोगों का स्वास्थ्य भी बेहतर होगा. जैविक खेती से उगाई गई फसलें न केवल पौष्टिक होती हैं, बल्कि उनमें हानिकारक रसायनों का अभाव होता है, जिससे बीमारियों का खतरा भी कम हो जाता है.
सीमित संसाधनों में हो सकते हैं बड़े बदलाव
चंद्र प्रकाश सिंह की यह पहल दिखाती है कि यदि इच्छाशक्ति और सही सोच हो, तो सीमित संसाधनों में भी बड़े बदलाव किए जा सकते हैं. बायोगैस स्लरी के माध्यम से उन्होंने खेती को एक नई दिशा दी है, जो पर्यावरण, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था तीनों के लिए लाभकारी है. बता दें कि आज जरूरत है कि इस तरह की पहलों को बढ़ावा दिया जाए, ताकि अधिक से अधिक किसान जैविक खेती अपनाएं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ और सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित किया जा सके.
.