दरअसल, मामला अशोकनगर के कृषक हरदीप कुमार अरोरा से जुड़ा था, जिन्होंने साल 2012 में तीसरे हथियार के लिए लाइसेंस मांगा था. हाईकोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए कहा कि शस्त्र अधिनियम की धारा 13 और 14 के अनुसार लाइसेंस तभी दिया जा सकता है, जब किसी को वास्तविक जान का खतरा हो. अदालत ने कहा कि सार्वजनिक शांति और सुरक्षा सर्वोपरि है और हथियार लाइसेंस का अंधाधुंध वितरण समाज के लिए खतरनाक साबित हो सकता है.
सिविल इंजीनियर देवेश उपाध्याय ने इस फैसले का स्वागत किया. उन्होंने लोकल 18 से कहा कि जब किसी के पास पहले से ही एक पिस्टल या बंदूक हो तो दूसरी और तीसरी बंदूक की जरूरत ही क्यों है? उनके अनुसार ऐसे मामलों में घटनाओं के बढ़ने की आशंका रहती है, शादियों में होने वाली हर्ष फायरिंग का उदाहरण देते हुए बताया कि कई निर्दोष लोगों की जान सिर्फ गलत हथियार हैंडलिंग की वजह से चली जाती है. देवेश का मानना है कि लाइसेंस तो लोग ले लेते हैं लेकिन न तो उन्हें सही ट्रेनिंग मिलती है और न ही जिम्मेदारी की समझ. यही वजह है कि अक्सर हथियार नौजवानों के हाथ में पहुंचकर शोबाजी और रील्स बनाने का जरिया बन जाते हैं.
अवैध हथियार का डर
देवेश ने यह भी जोड़ा कि भारत में लाइसेंसी हथियारों से कहीं ज्यादा, लगभग तीन गुना संख्या में अवैध हथियार मौजूद हैं. ऐसे में अगर लाइसेंस अमेरिका की तरह खुलेआम और आसानी से मिलने लगे तो अराजकता फैल सकती है. उन्होंने कहा कि गुस्सा एक ऐसी स्थिति है जो किसी से भी गोली चलवा सकती है और जो लोग हथियार केवल डराने के लिए रखते हैं वे भी कभी न कभी उसका इस्तेमाल कर बैठते हैं.
कांट्रेक्टर अंकुश प्राप्त सिंह ने कहा कि एक व्यक्ति के लिए दो हथियार पर्याप्त हैं. बड़ी बंदूक घर की सुरक्षा के लिए और पिस्टल सफर के दौरान काम आती है. उनका मानना है कि वैसे तो एक ही हथियार काफी है, क्योंकि लाइसेंस प्रक्रिया अपने आप में इतनी जटिल है कि उसे पार करना हर किसी के बस की बात नहीं.
तीसरे हथियार के पक्ष में राय
व्यापारी रमेश विश्वकर्मा का मत इससे बिल्कुल उलट रहा. उन्होंने कहा कि अगर किसी व्यक्ति के पास पहले से दो हथियार हैं और उसका रिकॉर्ड पूरी तरह साफ है उसने कभी कोई अपराध नहीं किया है, तो उसे तीसरे हथियार का लाइसेंस देने में हर्ज़ नहीं होना चाहिए. उनका कहना है कि सरकार को ऐसे मामलों में व्यक्ति की छवि और एरिया में उसकी साख देखकर फैसला करना चाहिए.
एडवोकेट रमेश पाठक ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि कानूनन एक ही लाइसेंस पर व्यक्ति अधिकतम दो हथियार रख सकता है, एक पिस्टल और एक 12 बोर या 315 राइफल. उनके अनुसार तीसरे हथियार का इजाफा खतरनाक हो सकता है और हादसों की आशंका बढ़ा सकता है. उन्होंने कहा अदालत का निर्णय पूरी तरह सही है क्योंकि यह सुरक्षा को प्राथमिकता देता है और जनता के हित में है.
हाईकोर्ट के इस आदेश ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि हथियार रखना अधिकार है या जिम्मेदारी. फिलहाल अदालत ने यह साफ कर दिया है कि परिवार में दो से अधिक हथियार रखने का कोई औचित्य नहीं है और शासन का मकसद समाज की शांति और सुरक्षा बनाए रखना है. जनता की मिली-जुली राय ने यह जरूर साबित कर दिया कि यह मुद्दा आने वाले समय में और गहराई से बहस का विषय बनेगा.
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