सामान्य नहीं है पहाड़ों की सोने जैसी हल्दी: रंग, सुगंध और सेहत का है खजाना

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पहाड़ी हल्दी की पहचान उसका गहरा नारंगी रंग और तीखी, मिट्टी जैसी प्राकृतिक खुशबू है. सामान्य बाजार में मिलने वाली हल्दी हल्के पीले रंग की होती है, जबकि पहाड़ी हल्दी का रंग लगभग केसरिया दिखाई देता है. इसका कारण इसमें पाया जाने वाला अधिक करक्यूमिन है. 

पहाड़ी हल्दी की पहचान उसका गहरा नारंगी रंग और तीखी, मिट्टी जैसी प्राकृतिक खुशबू है. सामान्य बाजार में मिलने वाली हल्दी हल्के पीले रंग की होती है, जबकि पहाड़ी हल्दी का रंग लगभग केसरिया दिखाई देता है. इसका कारण इसमें पाया जाने वाला अधिक करक्यूमिन है. जब इसे काटा जाता है तो भीतर से गाढ़ा रंग निकलता है और हाथों पर तुरंत रंग चढ़ जाता है. सूखने के बाद भी इसका रंग फीका नहीं पड़ता. यही वजह है कि पूजा, औषधि और विशेष व्यंजनों में इसे अधिक शुद्ध और शुभ माना जाता है.

पहाड़ी हल्दी में 3-4 प्रतिशत या उससे अधिक करक्यूमिन पाया जाता है, जबकि सामान्य हल्दी में यह मात्रा अक्सर 1-2 प्रतिशत ही रहती है. करक्यूमिन वह प्राकृतिक तत्व है जो शरीर में सूजन कम करने, संक्रमण से बचाने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है. यही कारण है कि आयुर्वेद में इसे शक्तिशाली औषधि माना गया है. कई जड़ी-बूटी विशेषज्ञ इसे प्राकृतिक एंटीबायोटिक बताते हैं. सर्दी-जुकाम, खांसी, गले के संक्रमण और चोट-घाव में इसका उपयोग सदियों से किया जा रहा है.

पहाड़ों के गांवों में इस हल्दी को मशीनों से नहीं बल्कि पारंपरिक तरीके से तैयार किया जाता है. पहले कंदों को उबालकर धूप में कई दिनों तक सुखाया जाता है, फिर स्थानीय महिलाएं ओखली-मूसल या पत्थर की चक्की से कूटकर इसका पाउडर बनाती हैं. यह मेहनत भरा काम ग्रामीण महिलाओं की आजीविका का भी महत्वपूर्ण स्रोत है. हाथ से पिसाई होने के कारण इसमें गर्मी नहीं बनती और इसके प्राकृतिक तेल सुरक्षित रहते हैं. इसी वजह से पहाड़ी हल्दी का स्वाद और औषधीय क्षमता लंबे समय तक बनी रहती है.

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आयुर्वेद में पहाड़ी हल्दी को त्वचा, पेट और जोड़ों की समस्याओं के लिए बेहद उपयोगी बताया गया है. दूध में मिलाकर पीने से सर्दी-खांसी में आराम मिलता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. चोट या सूजन पर इसका लेप लगाने से दर्द कम होता है. कई लोग इसे फेसपैक में मिलाकर त्वचा पर भी लगाते हैं जिससे दाग-धब्बे कम होते हैं और चमक बढ़ती है. इसमें एंटीसेप्टिक और एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं, जो शरीर को अंदर और बाहर दोनों तरह से सुरक्षा प्रदान करते हैं.

पहाड़ी हल्दी अब स्थानीय किसानों के लिए नकदी फसल बनती जा रही है. कम पानी और कम लागत में तैयार होने के कारण यह खेती के लिए फायदेमंद साबित हो रही है. कई स्वयं सहायता समूह इसे पैक करके शहरों तक भेज रहे हैं, जहां इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है. बाजार में इसकी कीमत सामान्य हल्दी से कई गुना अधिक मिलती है. खासकर ऑर्गेनिक उत्पाद पसंद करने वाले लोग इसे ऑनलाइन भी खरीद रहे हैं. इससे पहाड़ी गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं और पलायन रोकने में भी मदद मिल रही है.

उत्तराखंड के पर्व-त्योहारों और पारंपरिक अनुष्ठानों में पहाड़ी हल्दी का विशेष महत्व है. शादी-विवाह की हल्दी रस्म में इसे शुभ माना जाता है और देवी-देवताओं की पूजा में भी इसका प्रयोग किया जाता है. लोगों की मान्यता है कि यह शुद्धता और समृद्धि का प्रतीक है. कई घरों में इसे दवा और प्रसाद दोनों रूपों में रखा जाता है. लोक परंपराओं में नवजात शिशु की देखभाल और प्रसूता महिलाओं के उपचार में भी इसका उपयोग किया जाता रहा है. इसलिए यह केवल मसाला नहीं बल्कि पहाड़ की संस्कृति और जीवनशैली का अहम हिस्सा है.

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