अरबी के पत्तों में लिपटी उत्तराखंड की फेमस डिश! मिनटों में बनाएं ट्रेडिशनल पतोड, ट्राई करें ये रेसिपी

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Pahadi Patod Recipe: उत्तराखंड में पारंपरिक पर्वों और त्योहारों पर पतोड बनाना संस्कृति का एक खास हिस्सा है. यह स्वाद में लाजवाब, पोषक और बनावट में खास होता है. पतोड की पारंपरिक विधि और भाप में पकाने के तरीके से इसे कुरकुरा और नरम बनाया जाता है. जानिए इसे बनाने की आसान रेसिपी.

ऋषिकेश: उत्तराखंड न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध हैं, बल्कि यहां की पारंपरिक भोजन शैली भी बेहद खास है. पहाड़ों की ठंडी जलवायु और कठोर जीवन शैली ने यहां के भोजन को पौष्टिक, गर्म और स्वादिष्ट बनाया है. ऐसे में पतोड उत्तराखंड के पर्वों और त्योहारों का एक जरूरी हिस्सा बन गया है. यह डिश न केवल स्वाद में लाजवाब है बल्कि बनाने की विधि और परोसने का तरीका भी इसे और खास बनाता है. पारंपरिक त्योहारों और खास अवसरों पर घर-घर में पतोड बनाना एक उत्सव जैसा माहौल तैयार करता है.

पतोड बनाने की विधि
पतोड बनाने के लिए सबसे पहले चावल या गेहूं के आटे को अच्छे से छाना जाता है ताकि उसमें कोई गुठली न रहे. इसके बाद आटे में दही, हल्दी, हरी मिर्च, धनिया और अजवाइन जैसे मसाले मिलाए जाते हैं. इन मसालों से आटे में एक विशेष खुशबू और स्वाद आता है जो पतोड की पहचान बन जाता है. मसाले मिलाकर आटे को अच्छी तरह गूंथा जाता है ताकि यह नरम और लचीला हो जाए. इस गूंथे हुए आटे को फिर किसी चौड़ी पत्तियों जैसे अरबी के पत्ते पर फैलाया जाता है और रोल कर लिया जाता है. यह रोलिंग प्रोसेस बहुत ध्यान और मेहनत मांगती है क्योंकि रोल समान रूप से पतला होना चाहिए ताकि पकने पर यह अच्छी तरह से गल जाए और कुरकुरा भी बने.
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भाप पर पकता है पर पारंपरिक पतोड
रोल तैयार होने के बाद इसे भाप में पकाया जाता है. भाप में पकाने से पतोड अंदर से मुलायम और बाहर से हल्का सख्त बनता है. भाप से पकने की प्रक्रिया से इसके पोषक तत्व भी सुरक्षित रहते हैं और यह स्वाद में और भी बढ़ जाता है. पकने के बाद इस रोल को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है और फिर सरसों के तेल में तला जाता है. तेल में तला जाने पर इसका बाहरी हिस्सा कुरकुरापन पा लेता है जबकि अंदर का हिस्सा नरम और स्वादिष्ट रहता है. तले हुए पतोड की खुशबू ही लोगों को इसे खाने के लिए आकर्षित कर देती है.

पतोड को आमतौर पर चाय, दही या किसी हल्की चटनी के साथ परोसा जाता है. हल्की दही के साथ इसे खाने पर यह संतुलित और ताजगी भरा लगता है, वहीं गरमागरम चाय के साथ इसे खाने का अनुभव और भी मजेदार हो जाता है. त्योहारों और खास अवसरों पर परिवार और मित्रों के बीच पतोड साझा करना एक परंपरा बन चुकी है. यह केवल भोजन नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक प्रतीक भी है जो उत्तराखंड की पारंपरिक खान-पान संस्कृति को दर्शाता है.

Seema Nath

पिछले 5 साल से मीडिया में सक्रिय, वर्तमान में News18 हिंदी में कार्यरत. डिजिटल और प्रिंट मीडिया दोनों का अनुभव है. मुझे लाइफस्टाइल और ट्रैवल से जुड़ी खबरें लिखना और पढ़ना पसंद है.

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