नई दिल्ली. कोटक महिंद्रा बैंक अब 40 साल का हो चुका है. बैंक के संस्थापक उदय कोटक अब कार्यकारी भूमिका में नहीं हैं लेकिन वे बोर्ड में जरूर शामिल हैं. उदय कोटक ने सीमित पूंजी, अलग दृष्टिकोण और आनंद महिंद्रा के सहयोग से आज से चालीस पहले उस दौर में भारत की सबसे भरोसेमंद वित्तीय संस्थाओं में से एक की नींव रखी जब “स्टार्टअप” शब्द भारत के बिजनेस शब्दकोश का हिस्सा तक नहीं था. उदय कोटक ने 30 लाख रुपये की पूंजी के साथ कोटक महिंद्रा की शुरुआत एक वित्तीय सेवा प्रदाता कंपनी के रूप में की थी. उन्होंने अपने हिस्से का पैसा उधार लेकर जुटाया था. आज कोटक महिंद्रा बैंक का बाजार पूंजीकरण 4.18 लाख करोड़ रुपये है. उदय कोटक ने cnbctv18 को दिए एक इंटरव्यू में कोटक महिंद्रा बैंक के शुरू होने से लेकर इसके सफलता की सीढियां चढने तक के सफर के बारे में विस्तार से बताया.
उदय कोटक (Uday Kotak) बचपन में क्रिकेटर बनाना चाहते थे. चोट की वजह क्रिकेटर तो नहीं बन पाए पर बिजनेस की पिच पर खूब चौक्के-छक्के लगाए हैं. उनका परिवार कॉटन ट्रेडिंग करता था, लेकिन उदय को अपना यह फैमिली बिजनेस ज्यादा पसंद नहीं था. उन्होंने परिवार से अलग रहा चुनी. 1985 में उन्होंने एक इन्वेस्टमेंट कंपनी की नींव रखी.
कठिन था वह दौर
cnbcTV18 को उदय कोटक ने बताया कि 1985 में भारत का वित्तीय क्षेत्र अत्यधिक नियंत्रित था. “बैंकिंग का 97% हिस्सा सरकारी था. ब्याज दरें बहुत ज्यादा थीं. उधार लेने वालों को 17% देना पड़ता था और जमाकर्ताओं को केवल 6% मिलता था. बड़ी कंपनियों को सप्लाई करने वाले छोटे उद्योगों को भी इतने ऊंचे ब्याज पर फंड जुटाना मुश्किल था. उन्होंने इसी खामी को एक अवसर की तरह देखा और पहला बिज़नेस इसी समस्या को हल करने के लिए बनाया.
उदय ने बताया “हमने बिल डिस्काउंटिंग से शुरुआत की. बैंकों को जो 11% का मार्जिन मिलता था, हमने तय किया कि यह फायदा उपभोक्ताओं को दिया जा सकता है.” कोटक की कंपनी ने SMEs को 16% पर फंडिंग दी और व्यक्तियों को 12% रिटर्न देकर उन बिलों को रिडिस्काउंट करने का अवसर दिया. यह एक ‘विन-विन’ मॉडल था जिसने छोटे कारोबारियों को सस्ती दर पर वर्किंग कैपिटल दिलाया. इसी ने 1985–86 में उदय कोटक की कंपनी को तेजी से आगे बढ़ाया.
आनंद महिंद्रा से मुलाकात से बदली दिशा
कोटक की मुलाकात आनंद महिंद्रा से हुई. आनंद हार्वर्ड से पढकर लौटे थे और महिंद्रा यूजीन स्टील में काम कर रहे थे. उदय कोटक ने उन्हें एक वित्तीय मॉडल समझाया, जिसमें महिंद्रा के सप्लायर्स को कम ब्याज पर तुरंत भुगतान मिल सकता था. यह मॉडल महिंद्रा को खूब पसंद आया और वे उदय की कंपनी में पैसा लगाने को तैयार हो गए.
30 लाख लगा शुरू की कंपनी
उदय ने बताया, “हमने कुल ₹30 लाख से शुरुआत की. मैंने उधार लेकर ₹13.5 लाख लगाए. आनंद महिंद्रा ने ₹4.5 लाख लगाए. बाकी दोस्तों ने योगदान दिया. यही हमारी शुरुआती पूंजी थी. कई मायनों में आनंद महिंद्रा हमारे पहले वेंचर कैपिटलिस्ट थे.”
कैसे पड़ा कोटक महिंद्रा नाम
यह साझेदारी कंपनी की पहचान तय करने में भी अहम रही. कोटक ने वैश्विक वित्तीय दिग्गजों से प्रेरणा लेते हुए दोनों के नाम—”कोटक” और “महिंद्रा” कंपनी के नाम में रखने पर जोर दिया. उदय ने बताया, “गोल्डमैन सॉक्स, मॉर्गन स्टैनली, मेरिल लिंच… ये सभी परिवारों के नाम हैं. परिवार का नाम लगाने से ग्राहकों को भरोसा मिलता है. इसका मतलब है कि हम अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा रहे हैं.”
प्रोफेशनल एंटरप्रेन्योरशिप को किया फॉलो
संस्थापक-नेतृत्व वाली संस्था होते हुए भी कोटक ने “प्रोफेशनल एंटरप्रेन्योरशिप” की संस्कृति विकसित की. एक ऐसा मॉडल जिसमें उद्यमिता का जोखिम और प्रोफेशनल अनुशासन दोनों शामिल हों. कोटक कहते हैं, “बहुत से उद्यमी प्रोफेशनल नहीं बन पाते, और बहुत से प्रोफेशनल उद्यमी सोच नहीं रखते. हमारा विश्वास था कि दोनों का मिश्रण दीर्घकालिक सफलता देता है.” उदय की इसी सोच ने गोल्डमैन सॉक्स के साथ कैपिटल मार्केट साझेदारी, कार फाइनेंस में नवाचार, म्यूचुअल फंड, बीमा और अंततः बैंकिंग जैसे बड़े कदमों का रास्ता तैयार किया.
खूब आईं चुनौतियां
उदय ने बताया कि शुरुआती वर्षों में सीमित संसाधनों और कठोर नियामकीय ढांच ने खूब चुनौतियां दीं. कोटक इन्हें एक छुपा हुआ लाभ मानते हैं. उनका कहना है, “1985 का भारत बदलाव की दहलीज पर था. किसी स्तर पर, हम सही समय पर सही जगह थे.” चार दशक बाद, ₹30 लाख से शुरू हुआ यह स्टार्टअप भारत की सबसे बड़ी और सर्वाधिक विश्वसनीय वित्तीय संस्थाओं में बदल चुका है. और उदय कोटक के लिए सबसे अहम विश्वास वही है, अपने नाम और प्रतिष्ठा को दांव पर लगाकर विश्वास बनाना.
सावधानी, सरलता और विनम्रता दिलाती है सफलता
उदय कोटक का कहना है कि सफल बिजनेस के लिए तीन गुणों का होना जरूरी है. सावधानी, सरलता और विनम्रता. सावधानी (Prudence) दीर्घकाल तक स्थिर और टिकाऊ रहने के लिए जरूरी है. आपके उत्पाद अत्यधिक जटिल नहीं होने चाहिए. यानी सरल होंगे तो आसानी से लोग ग्रहण करेंगे. उदय का कहना हे कि कई बार बैंकर्स खुद को सबकुछ समझने लगते हैं. यह रवैया ठीक नहीं है. सफल होने के लिए विनम्र होना जरूरी है.
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