Last Updated:
Bilaspur News: पचपेड़ी गांव में हर रविवार गया बाई के घर पर काफी संख्या में मरीज पहुंचते हैं. वे नारियल और अगरबत्ती लेकर श्रद्धा भाव से आते हैं. बरसों से चली आ रही इस परंपरा पर लोगों का अटूट भरोसा है.
बिलासपुर. सर्दी का मौसम आते ही पाइल्स की समस्या तेजी से बढ़ने लगती है. ठंड में अनियमित दिनचर्या, कम पानी पीना और शारीरिक गतिविधि में कमी इस रोग को और गंभीर बना देती है. ऐसे समय में जहां आधुनिक इलाज महंगा साबित होता है, वहीं छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के पचपेड़ी गांव की गया बाई का पारंपरिक और आयुर्वेदिक उपचार लोगों के लिए राहत का बड़ा सहारा बनकर सामने आया है. हर रविवार उनके पास दूरदराज से मरीज पहुंचते हैं और गुल अब्बास की जड़ से बने इस देसी इलाज को रामबाण मान रहे हैं. आयुर्वेदिक विशेषज्ञ डॉ अनिल सोनी के अनुसार, शीत ऋतु में वात दोष बढ़ जाता है. इसके साथ ही लोग कम पानी पीते हैं, शारीरिक मेहनत घट जाती है और खानपान भी अनियमित हो जाता है. इन कारणों से कब्ज की समस्या बढ़ती है, जो पाइल्स को जन्म देती है. मल त्याग के दौरान दर्द, जलन और रक्तस्राव जैसी परेशानियां ठंड में अधिक देखने को मिलती हैं.
गुल अब्बास की जड़ से तीन दिन का इलाज
तैयार पेस्ट में खड़ी शक्कर मिलाई जाती है और यह मिश्रण मरीज को तीन दिनों तक खाली पेट सेवन करने को दिया जाता है. गया बाई का दावा है कि यह उपचार पूरी तरह प्राकृतिक है और इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं होता. इलाज कराने वाले कई मरीजों का कहना है कि इस देसी उपचार की तीन खुराक से उन्हें कुछ ही दिनों में दर्द, जलन और रक्तस्राव से राहत मिली है. कई मामलों में पाइल्स पूरी तरह ठीक होने का दावा भी किया गया है. यही वजह है कि ठीक हुए मरीज अपने परिचितों को भी गया बाई के पास भेजते हैं.
गुल अब्बास, जिसे अंग्रेजी में मिराबिलिस जलापा कहा जाता है, एक कंदीय और सजावटी पौधा है. इसकी जड़ें प्याज जैसी होती हैं और इसके रंग-बिरंगे फूल दोपहर में खिलते हैं. यह पौधा मूल रूप से मेक्सिको और मध्य अमेरिका का है लेकिन अब भारत में भी आसानी से उगाया जाता है और अपने औषधीय गुणों के लिए जाना जाता है. डॉ अनिल सोनी का कहना है कि पाइल्स से बचाव और राहत के लिए केवल दवा ही नहीं बल्कि सही दिनचर्या भी जरूरी है. नियमित समय पर भोजन, गर्म पानी का सेवन, फाइबर युक्त आहार, हरी सब्जियां, फल और हल्का योग-व्यायाम अपनाकर इस समस्या से काफी हद तक बचा जा सकता है.
परंपरा और आयुर्वेद का भरोसेमंद मेल
आज जब महंगे इलाज आम लोगों की पहुंच से बाहर होते जा रहे हैं, ऐसे में गया बाई का यह पारंपरिक उपचार ग्रामीण अंचलों में आशा की किरण बनकर उभरा है. ठंड के मौसम में बढ़ते पाइल्स की समस्या के बीच यह इलाज परंपरा, प्रकृति और आयुर्वेद का ऐसा मेल है, जिस पर लोगों का भरोसा लगातार मजबूत होता जा रहा है.
About the Author
राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.
Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.