Middle East Tensions: वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव के कारण हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं. अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हमलों और ईरान के जवाबी अटैक में अब तक सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है. कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और वर्ष 2022 के बाद पहली बार क्रूड ऑयल 100 डॉलर का आंकड़ा पार कर करीब 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है. इस बीच रेटिंग एजेंसी फिच की एक रिपोर्ट भारत सहित कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए चिंताजनक संकेत दे रही है.
फिच की चौंकाने वाली रिपोर्ट
अपनी रिपोर्ट में रेटिंग एजेंसी फिच ने सोमवार को कहा कि ईरान से जुड़े युद्ध की स्थिति के कारण उभरती अर्थव्यवस्थाओं को तेल और गैस के आयात, प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजी जाने वाली विदेशी मुद्रा तथा विनिमय दर जैसे क्षेत्रों में अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. ‘ईरान संघर्ष से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए उपजे नए ऋण जोखिम’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि खाड़ी क्षेत्र से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में अपेक्षा से अधिक व्यवधान उत्पन्न होता है, तो इसका वैश्विक निवेशकों की धारणा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है.
रिपोर्ट के अनुसार ऐसी स्थिति में अमेरिकी डॉलर और मजबूत हो सकता है, जिससे खासकर उच्च जोखिम वाले उधारकर्ताओं के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कर्ज जुटाना कठिन हो जाएगा. फिच ने यह भी कहा कि ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई पर दबाव बढ़ेगा और इससे दुनिया भर में मौद्रिक नीतियों के फैसलों पर भी असर पड़ सकता है.
लंबे युद्ध का गंभीर प्रभाव
फिच की रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि इस युद्ध का सबसे सीधा असर तेल और गैस के आयात पर पड़ेगा. भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था में शुद्ध जीवाश्म ईंधन का आयात सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग 3 प्रतिशत या उससे अधिक के बराबर है. रेटिंग एजेंसी के अनुसार यदि होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते तेल और गैस का परिवहन एक महीने से कम समय के लिए बाधित रहता है और क्षेत्र के तेल उत्पादन ढांचे को बड़ा नुकसान नहीं होता, तो उभरती अर्थव्यवस्थाओं की साख पर जोखिम सीमित रह सकता है.
हालांकि, यदि यह व्यवधान लंबे समय तक बना रहता है, तो इसका प्रभाव कहीं अधिक गंभीर हो सकता है. आयात की लागत बढ़ने से पाकिस्तान जैसे उन देशों पर ज्यादा दबाव पड़ेगा जिनकी वित्तीय स्थिति पहले से कमजोर है या जिनका चालू खाता घाटा अधिक है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यदि ऊर्जा की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो उन सरकारों पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है जो उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए ईंधन पर सब्सिडी देती हैं या कीमतों में बढ़ोतरी के जवाब में नई राहत योजनाएं लागू करती हैं.
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