जुबान पर ‘रसगुल्ले’ जैसी मिठास भर देगी ये पहाड़ी डिश, आटे और गुड़ से मिनटों में हो जाएगी तैयार, देखें रेसिपी

पिथौरागढ़: शहरों में रहने वाले बहुत से लोग आज भी पहाड़ों की एक सादी लेकिन खास मिठास से अनजान हैं, जबकि पहाड़ों में यह मीठी डिश रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा रही है. न किसी त्योहार का इंतजार, न किसी खास मौके की जरूरत, जब मन किया, घर में मौजूद आटा और गुड़ से यह मिठाई बना ली जाती है. यही तो पहाड़ों की खूबसूरती है, जहां कम चीजों में भी ज़्यादा स्वाद और अपनापन होता है.

इस मिठाई की खास बात यह है कि इसमें सिर्फ दो ही चीजें लगती हैं, आटा और गुड़. न कोई रंग, न फ्लेवर, न केमिकल और न ही किसी तरह की मिलावट. आज के समय में, जब ज़्यादातर मिठाइयां केमिकल और प्रिजर्वेटिव से भरी होती हैं, तब पहाड़ों की यह मिठास एक सुकून देने जैसा एहसास कराती है. इसका स्वाद हल्का, मीठा और बिल्कुल घर जैसा होता है.

शरीर को गर्म रखने में मददगार

पहाड़ों के घरों में यह मिठाई खासतौर पर ठंड के मौसम में बनाई जाती है. इसकी एक वजह है गुड़, जो शरीर को गर्म रखने में मदद करता है और दूसरी वजह है आटा, जो ताकत और ऊर्जा देता है. ठंडी सुबह या शाम को गरम-गरम बनी यह मिठाई खाने का मज़ा ही कुछ और होता है. बड़े-बुज़ुर्ग इसे सेहत के लिए भी अच्छा मानते हैं और बच्चों को बड़े चाव से खिलाते हैं.

गुलल्या पतोका बनाने की विधि 

इस पारंपरिक पहाड़ी मिठाई का नाम है गुलल्या पतोका. इसे बनाने की विधि भी उतनी ही सादी है, जितनी इसकी पहचान. सबसे पहले 1 कप आटा, जो दो दिन बासी गूंथे हुए आटे की एक लोई ली जाती है. इस लोई को 100 ग्राम पिघले हुए गुड़ में अच्छे से गूंथ लिया जाता है, ताकि आटा और गुड़ आपस में अच्छी तरह मिल जाएं. इसके बाद थोड़ा-सा गर्म पानी डालकर इसे पतला बैटर बना लिया जाता है.

फूलने और पकने के बाद निकालें

अब कढ़ाही में तेल गरम किया जाता है. जब तेल अच्छे से गरम हो जाए, तो चम्मच की मदद से बैटर को धीरे-धीरे तेल में डाला जाता है. कुछ ही देर में ये नीचे से पकने लगते हैं, फिर इन्हें पलट दिया जाता है. देखते ही देखते ये फूलने लगते हैं और सुनहरे भूरे रंग के हो जाते हैं. जब अच्छे से पक जाए, तो इन्हें तेल से निकाल लिया जाता है.

गरम-गरम गुलल्या पतोका खाते समय सिर्फ स्वाद ही नहीं आता, बल्कि उसमें पहाड़ों की सादगी, घर की गर्माहट और पुरानी यादों की मिठास भी घुली होती है. यही वजह है कि यह मिठाई आज भी पहाड़ों के हर घर में ज़िंदा है और दिलों से जुड़ी हुई है.

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