MP के इस जिले में ‘लाल खजाना’, यही है…अयोध्या राम मंदिर की मजबूती का राज! निर्माण के समय गया था 32 टन

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Balaghat Copper Mines: बालाघाट का वो खजाना है, जिसकी धमक पूरे देश में है. इसी लाल खजाने का 32 टन हिस्सा अयोध्या राम मंदिर में लगा है. एक्सपर्ट का दावा है कि इस वजह से मंदिर हजारों साल तक मजबूत रहेगा.

Balaghat News: मध्य प्रदेश के बालाघाट जिला वनों से लेकर खनिज पदार्थों के लिए पूरे देश में अलग पहचान रखता है. बालाघाट तांबा उत्पादन में भी काफी आगे है. यहां के मलाजखंड कॉपर प्रोजेक्ट ने अब ऐसा कुछ किया है, जिससे जिला का नाम इतिहास के पन्ने में हमेशा के लिए दर्ज हो चुका है. दरअसल, अयोध्या में बने भगवान रामलला के मंदिर निर्माण में 32 टन शुद्ध तांबा बालाघाट से दान दिया गया है. ऐसे में अब हजारों साल बालाघाट का तांबा राम मंदिर को मजबूती देगा.

राम मंदिर में बालाघाट का तांबा 
मलाजखंड हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और यूनिट हेड नागेश शेणाय ने बताया, कंपनी ने राम मंदिर निर्माण के लिए 32 टन तांबा दान दिया है. इसमें करीब 70 हजार कॉपर स्ट्रिप और 775 कॉपर रॉड शामिल है. इनके इस्तेमाल से मंदिर में लगे विशाल पत्थरों को मजबूती से जोड़ने का काम किया गया है. ऐसे में मंदिर के स्ट्रक्चर को मजबूती मिलेगी.

हजारों साल मजबूत रहेगा राम मंदिर
नागेश शेणाय का कहना है कि हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड ने जो तांबा दिया है, वह करीब 99.9 प्रतिशत तक शुद्धता वाला इलेक्ट्रो रिफाइंड कैटेगरी का है. यह अपनी क्वालिटी और मजबूती के कारण हजारों सालों तक पत्थरों को जोड़ने में मदद करेगा. बता दें कि तांबा एक शाश्वत धातु है, जिसके गुण कभी कम नहीं होते. वहीं, तांबा भारतीय संस्कृति और धार्मिक धरोहर का हिस्सा रहा है. ऐसे में बालाघाट से राम मंदिर के लिए तांबा जाना बेहद गौरवपूर्ण है.

ऐतिहासिक धरोहर में जिंदा रहेगा बालाघाट
बालाघाट जिले का नाम इतिहास के पन्नों में राम मंदिर के निर्माण कार्य में दिए जाने वाले योगदान में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया है. ऐसे में ये योगदान बालाघाट और मध्य प्रदेश के लिए गर्व का विषय है. अब राम मंदिर में बालाघाट का योगदान इसे ऐतिहासिक धरोहर में जीवित रखेगा.

देश का सबसे बेहतर तांबा देने वाली खदान बालाघाट में
भारत का सबसे बड़ा तांबा भंडार बालाघाट में है. मलाजखंड कॉपर प्रोजेक्ट की स्थापना साल 1982 में हुई. भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने 1969 के दौरान इस भंडार का व्यवस्थित भूवैज्ञानिक अन्वेषण किया. अयस्क का खनन पट्टा 1973 में एचसीएल को प्रदान किया गया. समय के साथ, इस परियोजना को व्यवहार्य परिचालन विकास के साथ आगे बढ़ाया गया.

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