टीबी के बैक्टीरिया एंटीबायोटिक दवाओं को ऐसे देते हैं धोखा, IIT बॉम्बे की स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा

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TB Bacteria Hide from Antibiotics: आईआईटी बॉम्बे की एक नई स्टडी में खुलासा हुआ है कि टीबी के बैक्टीरिया अपनी बाहरी लिपिड कोटिंग को बदलकर एंटीबायोटिक दवाओं को धोखा दे देते हैं. ऐसी कंडीशन में टीबी के बैक्टीरिया को मारने के लिए 2 से 10 गुना ज्यादा दवा की जरूरत होती है. यह रेजिस्टेंस जीन परिवर्तन के कारण नहीं, बल्कि उनकी झिल्ली की कठोर संरचना के कारण होता है. अगर झिल्ली को कमजोर कर दिया जाए, तो टीबी का ट्रीटमेंट ज्यादा असरदार हो सकता है.

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हालिया स्टडी में पता चला है कि टीबी के बैक्टीरिया एंटीबायोटिक दवा को धोखा दे देते हैं.

New Study on TB Bacteria: ट्यूबरकुलोसिस (TB) एक गंभीर बीमारी है, जो माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नामक बैक्टीरिया के कारण होती है. यह बीमारी सबसे ज्यादा फेफड़ों को प्रभावित करती है और शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकती है. सबसे चिंता की बात यह है कि टीबी की बीमारी हवा के जरिए फैलती है. जब संक्रमित व्यक्ति खांसता या छींकता है, तो अन्य लोग भी इसकी चपेट में आ सकते हैं. अगर किसी व्यक्ति को लगातार 2 सप्ताह से ज्यादा खांसी, बुखार, रात में पसीना आना, वजन कम होना और कमजोरी जैसे लक्षण दिखें, तो टीबी की जांच करानी चाहिए. टीबी का इलाज एंटीबायोटिक दवाओं से किया जाता है. समय पर इलाज न मिलने पर यह बीमारी जानलेवा हो सकती है.

टीबी कई दशकों से दुनियाभर में गंभीर समस्या बनी हुई है. तमाम कोशिशों के बावजूद इसे पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका है. आईआईटी बॉम्बे ने इस पर एक स्टडी की है, जिससे पता चलता है कि माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस अपनी ऊपरी फैट कोटिंग को बदलकर एंटीबायोटिक दवाओं को धोखा देता है. इसकी वजह से ट्रीटमेंट के बावजूद ये बैक्टीरिया लंबे समय तक शरीर में बने रहते हैं. यही वजह है कि एंटीबायोटिक्स और बड़े स्तर पर वैक्सीनेशन ड्राइव के बावजूद यह बीमारी मौत का बड़ा कारण बनी हुई है. साल 2023 में दुनिया के लगभग 1 करोड़ से अधिक लोग टीबी से ग्रसित हुए और 12 लाख से ज्यादा लोगों की इससे मौत हो गई. भारत में इसके संक्रमितों की तादाद सबसे ज्यादा है; यहां 2024 में 26 लाख से अधिक मरीज मिले.

केमिकल साइंस नामक जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में इस बात की खोज की गई कि दवा से बेअसर रहने का रहस्य टीबी के बैक्टीरिया की झिल्लियों यानी मेम्ब्रेन्स में छिपा हो सकता है. ये झिल्लियां फैट्स या लिपिड से बनी जटिल भित्तियां होती हैं जो सेल्स की रक्षा करती हैं. एक्सपर्ट्स ने जब माइकोबैक्टीरियम स्मेग्मैटिस बैक्टीरिया को टीबी की 4 दवाओं रिफाब्यूटिन, मोक्सीफ्लोक्सासिन, अमीकासिन और क्लैरिथ्रोमाइसिन के संपर्क में लाया, तो बैक्टीरिया की 50 फीसदी वृद्धि को रोकने के लिए आवश्यक दवा की कंसंट्रेशन एक्टिव बैक्टीरिया जीवाणु की तुलना में डार्मेंट बैक्टीरिया में 2 से 10 गुना अधिक थी.

आईआईटी बॉम्बे की प्रोफेसर शोभना कपूर ने इसे समझाते हुए कहा कि वही दवा जो बीमारी के शुरुआती स्टेज में असरदार थी, लेकिन बाद में इसकी ज्यादा मात्रा की जरूरत हो गई. यह परिवर्तन जेनेटिक म्यूटेशन के कारण नहीं हुआ था, जो सामान्यतः एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस में होता है. दवा के प्रति घटी सेंसिटिविटी बैक्टीरिया की प्रसुप्त अवस्था और उनकी झिल्ली की परतों से जुड़ी हो सकती है. एंटीबायोटिक्स को धोखा देने वाली बाह्य झिल्ली को कमजोर करने से दवाओं के असर को बढ़ाया जा सकता है. अगर पुरानी दवाओं को भी एक ऐसे अणु के साथ कंबाइन किया जाए, जो बाहरी झिल्ली को शिथिल कर दे, तो इन दवाओं का असर ज्यादा अच्छा हो सकता है.

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अमित उपाध्याय

अमित उपाध्याय News18 Hindi की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें

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टीबी के बैक्टीरिया एंटीबायोटिक दवाओं को ऐसे देते हैं धोखा, स्टडी में खुलासा

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