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किसान अब ऐसी फसल की ओर ध्यान दे रहे हैं, जो कम समय में अधिक मुनाफा दे सके. इसी कड़ी में हम बात कर रहे हैं एक खास हरे साग की, जिसे खेसारी साग के नाम से जाना जाता है. यह साग कम लागत में जल्दी बंपर उत्पादन देती है और इसकी खेती कर बड़ी संख्या में किसान अच्छी कमाई कर रहे हैं.
किसान अब ऐसी फसल उगाने पर अधिक ध्यान दे रहे हैं, जो कम समय में बंपर इनकम दिला सके. इसी कड़ी में एक खास हरे साग की खेती चर्चा में है, जिसे खेसारी साग के नाम से जाना जाता है. यह साग बेहद कम लागत में कम समय के भीतर अच्छी पैदावार देता है. यही वजह है कि किसान अब ज्यादा मुनाफा देने वाली फसलों को तरजीह दे रहे हैं और खेसारी साग की खेती कर बड़ी संख्या में अच्छी कमाई कर रहे हैं.

कई किसानों का कहना है कि एक बीघा में खेसारी साग की खेती करने पर महज 4 से 5 महीनों में ही अच्छा मुनाफा मिलने लगता है. उनका कहना है कि सर्दियों के मौसम में इस हरी सब्जी की डिमांड काफी बढ़ जाती है. इसके सेवन से खून की कमी की समस्या दूर होने में मदद मिलती है. इसमें प्रोटीन की पर्याप्त मात्रा होने के कारण बाजार में इसकी मांग अक्सर बनी रहती है.

जानकारी के अनुसार, करीब 1 एकड़ भूमि में 30 किलो खेसारी बीज के साथ खाद और कीटनाशक दवा मिलाकर छिड़काव किया जाता है. इसके बाद अधिक देखभाल की जरूरत नहीं पड़ती और फसल लगभग 130 दिनों में तैयार हो जाती है. एक एकड़ में इसकी उपज 4 से 5 क्विंटल तक मिल सकती है. कृषि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित खेसारी साग की उन्नत किस्में रतन और प्रतीक हैं, जिन्हें सरकार द्वारा किसानों को उपलब्ध कराया गया है.
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जानकारी के अनुसार, इसे सिंचाई करने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे जोताई और पानी दोनों की बचत होती है. यह फसल रेहरे (बंजर) जैसी जमीन में भी बेहतर उपज देती है. किसानों के लिए सलाह है कि वे केवल सुझाई गई उन्नत किस्मों की ही खेती करें, ताकि अधिक लाभ मिल सके. खेसारी साग की खासियत है कि यह हर परिस्थिति में अच्छी पैदावार देती है, इसलिए इसे “बीमा फसल” के नाम से भी जाना जाता है.

खेसारी साग की खेती अक्टूबर से नवंबर के बीच की जाती है. बुवाई के 35 दिन बाद निराई और खरपतवार नियंत्रण करना जरूरी होता है. यदि इसे चारे की फसल के रूप में लेना हो, तो फूल आने के 50 फीसदी चरण के बाद कटाई कर लेनी चाहिए. मार्च के अंत तक फसल कटाई के लिए पूरी तरह तैयार हो जाती है.