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मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी के बीचोंबीच बना एक ऐतिहासिक किला आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है. यह किला न सिर्फ अपनी अनूठी बनावट के लिए जाना जाता है बल्कि लगभग 620 साल पुराने मुगल का इतिहास की गवाही भी देता है. दो जिलों की सीमा पर स्थित यह किला प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक विरासत का अनोखा संगम है.
मध्य प्रदेश के देवास और हरदा जिले की सीमा पर नर्मदा नदी के बीच एक टापू नुमा ऊंचे टीले पर जोगा किला स्थित है. चारों ओर बहती नर्मदा और हरियाली की चादर इस किले को बेहद खास बनाती है. किला नदी के बीच होने के कारण दूर से ही आकर्षक नजर आता है. यहां पहुंचने के लिए पर्यटकों को नाव का सहारा लेना पड़ता है.

नाव से नर्मदा की लहरों को चीरते हुए किले तक पहुंचना अपने आप में एक रोमांचक अनुभव है. यही वजह है कि दूर-दूर से पर्यटक इस किले को देखने आते हैं. नदी के बीच स्थित होने के कारण यह किला अन्य दुर्गों से बिल्कुल अलग पहचान रखता है. बारिश और ठंड के मौसम में इसका सौंदर्य और भी निखर जाता है.

नाव से उतरते ही कुछ कदम ऊपर चढ़ने पर किले का विशाल और मजबूत मुख्य द्वार दिखाई देता है. यह द्वार उस दौर की स्थापत्य कला और सुरक्षा व्यवस्था की झलक देता है. द्वार से भीतर प्रवेश करते ही पत्थर की सीढ़ियां ऊपर की ओर जाती हैं. इन सीढ़ियों से किले के ऊपरी हिस्से तक पहुंचा जाता है.
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किले के ऊपर पहुंचने पर दीवारों में बने झरोखे नजर आते हैं, जहां से नीचे नर्मदा का पूरा नजारा दिखाई देता है. इन्हीं झरोखों से कभी सैनिकों ने दुश्मनों पर नजर रखी होगी. किले के ऊपरी हिस्से में एक जनरल का मकबरा भी मौजूद है. आज यहां लोग परिवार और दोस्तों के साथ घूमने आते हैं.

किले की सबसे बड़ी खासियत यहां से दिखाई देने वाला सूर्योदय और सूर्यास्त का दृश्य है. नर्मदा नदी के बीच स्थित होने के कारण चारों ओर पानी और प्राकृतिक सुंदरता फैली रहती है. आसपास का हराभरा वातावरण और पक्षियों की चहचहाहट सुकून का अहसास कराती है. प्रकृति प्रेमियों के लिए यह जगह बेहद खास है.

इतिहासकारों के अनुसार, इस दुर्ग का निर्माण 1406 ईस्वी में मांडू के सुल्तान होशंगशाह गौर ने करवाया था. बाद में जाट शासक राव जोगा सिंह ने भी यहां शासन किया और किले का जीर्णोद्धार कराया. सुरक्षा की दृष्टि से किले को नर्मदा नदी के बीचोंबीच बनाया गया. यह स्थान रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता था.

किले के चारों ओर बंदूकें और तोपें लगाने की व्यवस्था थी, जिनके अवशेष आज भी खंडहरों में दिखते हैं. किला दो भागों में बंटा हुआ है और इसमें पहुंचने के लिए अलग-अलग रास्ते थे. आज भी इस किले तक पहुंचने का मुख्य साधन नाव या डोंगा ही है. यह किला आज भी अपने गौरवशाली अतीत की कहानी बयां करता है.
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