हजारों नवजातों तक मां का दूध पहुंचाने वाली इन डॉक्टर को मिलेगा पद्मश्री, कौन हैं पहली ह्यूमन मिल्क बैंक खोलने वाली ये महिला

भारत सरकार ने पद्म पुरुस्कारों की घोषणा कर दी है. पद्म श्री से लेकर पद्म विभूषण पाने वाले लोगों में एक ऐसी शख्सियत भी शामिल हैं, जिन्होंने हजारों नवजात बच्चों तक मां का दूध पहुंचाने के लिए ऐसा काम किया जो भारत ही नहीं पूरे एशिया महाद्वीप में पहले किसी ने नहीं किया था. पेशे से नवजात शिशु रोग विशेषज्ञ (neonatologist) डॉ. आर्मिडा फर्नांडीज को इस बार पद्मश्री पुरुस्कार देने की घोषणा की गई है.

महाराष्ट्र के मुंबई में नियोनेटोलॉजिस्ट डॉ. आर्मिडा ने जन्म लेने के बाद मां के दूध से वंचित बच्चों के लिए पहला ह्यूमन मिल्क बैंक खोला था. आज से करीब 36 साल पहले जब इन्होंने ये बैंक खोला था तो किसी को अंदाजा नहीं था कि यह पहल इतनी अद्भुत होगी कि इसके बाद पूरे भारत में 100 से भी ज्यादा ब्रेस्ट मिल्क या ह्यूमन मिल्क बैंक खुल जाएंगी और भारतीय महिलाएं गर्व से इन बैंकों में अपना ब्रेस्ट मिल्क दान करेंगी.
कैसे शुरु हुआ डॉ. फर्नांडीज का सफर
साल 1972 की बात है जब डॉ. आर्मिडा मुंबई के सायन अस्पताल में नियोनैटोलॉजी विभाग की डॉक्टर थीं और बच्चों के इलाज के दौरान उन्होंने महसूस किया कि बहुत सारे नवजात बच्चे बीमारियों के चलते जिंदा नहीं रह पा रहे थे. गहनता से देखने पर उन्हें मालूम हुआ कि बच्चों में दस्त और इन्फेक्शंस की समस्या ज्यादा आ रही थी, जो कि बच्चों को मां का दूध न मिलने और फॉर्मूला या बोतल वाले दूध पर निर्भरता की वजह से से हो रहा था, तो उन्होंने इस समस्या का एक तोड़ निकाला कि कैसे हर नवजात बच्चे को ब्रेस्ट मिल्क मिले, फिर चाहे मां कोई और ही क्यों न हो.

उन्होंने पाया कि मां के दूध में पाया जाने वाला कोलोस्ट्रम बच्चे को न केवल सभी प्रकार के संक्रमणों से बचाता है बल्कि बच्चों की रोग प्रतिरोधक शक्ति और पाचन तंत्र को भी मजबूत करता है. खासतौर पर करीब एक से सवा महीने तक बच्चों को मां का दूध मिलना बेहद जरूरी है. इससे बच्चे का वजन, ब्लड शुगर भी संतुलित रहता है.

कब शुरू किया पहला ह्यूमन मिल्क बैंक

इसके बाद डॉ. फर्नांडीज ने स्वस्थ स्तनपान कराने वाली मांओं से अतिरिक्त दूध दान करने की अपील की. यह अपील काम कर गई और उन बच्चों को भी मां का दूध मिलने लगा, जिनकी मांओं के पर्याप्त दूध नहीं आ रहा था. पहल की सफलता के बाद डॉ. आर्मिडा ने ऐसी व्यवस्था सोची कि दूध को स्टोर करने के लिए कोई बैंक बनाया जाना चाहिए ताकि दान किए गए दूध को कुछ समय बाद तक इस्तेमाल किया जा सके और इस तरह सायन अस्पताल में 1989 में एशिया का पहला ह्यूमन मिल्क बैंक स्थापित हुआ.

नवजातों की मृत्यु दर में कमी, बच्चों की सेहत में सफलता के बाद मुंबई के अन्य अस्पतालों में भी ह्यूमन बैंक खोले गए और बाद में रोटरी क्लब के सहयोग से यह तरीका देशभर में फैल गया. आज बड़ी संख्या में स्तनपान कराने वाली माएं, अतिरिक्त दूध दान करती हैं.

आंकड़े बताते हैं कि 2025 में जारी हुई भारत सरकार की सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) रिपोर्ट के अनुसार देश में मातृ और शिशु स्वास्थ्य में बड़ा सुधार हुआ. शिशु मृत्यु दर 39 से घटकर 27 प्रति 1,000 जीवित जन्म हो गई है. वहीं नवजात मृत्यु दर 26 से घटकर 19 प्रति 1,000 जीवित जन्म रह गई है.

डॉ. आर्मिडा ने इसके बाद स्नेहा यानि सोसाइटी फॉर न्यूट्रिशन, एजुकेशन एंड हेल्थ एक्शन, SNEHA की स्थापना की. यह संस्था मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य, बाल पोषण और महिलाओं के खिलाफ हिंसा जैसे मुद्दों पर काम करती है. यह संस्था पेलिएटिव केयर और डिमेंशिया केयर सेवाएं भी देती है. यहां तक कि इसके डॉक्टरों, नर्सों और काउंसलर्स की टीम मुंबई की झुग्गी बस्तियों में घर-घर जाकर भी सेवा देती है.

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