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Poultry Farming: सर्दियों में इंसानों की ही तरह मुर्गियों में भी बदलते मौसम का असर होता है जिससे वे बीमार होने लगती हैं. विंटर सीजन में मुर्गीपालन व्यवसाय में ईकोलाइ और कोली-सेप्टिसीमिया बड़ा खतरा है, जिससे हजारों पक्षी मर सकते हैं. साफ-सफाई, जैव सुरक्षा, सही शेड डिज़ाइन और समय पर इलाज जैसे उपाय अपनाकर इस बीमारी से बचाव संभव है.
Poultry Farming: मध्य प्रदेश के सीधी जिले में अंडा और मांस उत्पादन के लिए मुर्गीपालन तेजी से उभरता हुआ व्यवसाय बन चुका है. बड़ी संख्या में किसान इसे आमदनी का मुख्य साधन बना रहे हैं. लेकिन सर्दियों के मौसम में इस कारोबार पर गंभीर खतरा मंडराने लगता है. ईकोलाइ और कोली-सेप्टिसीमिया जैसी बीमारियां न सिर्फ मुर्गियों की जान ले रही हैं, बल्कि किसानों को भारी आर्थिक नुकसान भी पहुंचा रही हैं.
पशु चिकित्सक डॉ. सलिल कुमार पाठक ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि ईकोलाइ बीमारी मुख्य रूप से बाहरी वातावरण से फैलने वाले परजीवी और बैक्टीरिया के कारण होती है, जो मुर्गियों के चारे और पानी के जरिए शरीर में प्रवेश कर जाते हैं. ईकोलाइ से संक्रमित मुर्गियों में खूनी दस्त, सुस्ती, पंखों का खड़ा होना और सांस लेने में दिक्कत जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. धीरे-धीरे मुर्गियां खाना-पीना छोड़ देती हैं और कमजोरी के कारण उनकी मौत तक हो सकती है. यह बीमारी छोटे चूजों के साथ-साथ वयस्क मुर्गियों को भी प्रभावित करती है. इसकी पुष्टि के लिए पशु चिकित्सकों द्वारा मुर्गियों की मल की जांच की जाती है.
मुर्गियों में बीमारे के लक्षण
डॉ. सलिल कुमार पाठक का कहना है कि ईकोलाइ और कोली-सेप्टिसीमिया बेहद खतरनाक हैं और अगर समय रहते नियंत्रण न किया जाए तो पूरा पोल्ट्री शेड इसकी चपेट में आ सकता है. इससे उत्पादन पूरी तरह ठप हो सकता है और किसानों को हजारों रुपये का नुकसान उठाना पड़ सकता है. बचाव के लिए साफ-सफाई और जैव सुरक्षा सबसे जरूरी उपाय माने जा रहे हैं. पोल्ट्री फार्म में काम करने वालों को अलग कपड़े, मास्क और जूते इस्तेमाल करने चाहिए, शेड में प्रवेश से पहले चूना या कीटाणुनाशक का उपयोग जरूरी है. बाहरी लोगों की एंट्री पर रोक लगाना भी बेहद अहम है.
टीकाकरण एवं साफ सफाई से टलेगा खतरा
शेड की जगह का चयन भी बीमारी रोकने में अहम भूमिका निभाता है. शेड ऊंचाई पर होना चाहिए ताकि पानी जमा न हो, आसपास गंदे नाले, दलदली इलाके या खुले जल स्रोत नहीं होने चाहिए, मृत पक्षियों को खुले में फेंकने के बजाय जलाना या गड्ढा खोदकर दफनाना चाहिए, इसके अलावा पक्षियों को ताजा, पौष्टिक चारा और साफ पानी देना जरूरी है. खराब या फफूंद लगा चारा बीमारी को और बढ़ा सकता है.समय-समय पर पशु चिकित्सक से सलाह लेकर ही दवाइयों और टीकाकरण का उपयोग करना चाहिए, सही देखभाल से ही मुर्गीपालन को नुकसान से बचाया जा सकता है.
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विभांशु द्विवेदी मूल रूप से मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के रहने वाले हैं. पत्रकारिता में 5 साल का अनुभव है. इन्होंने कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय रायपुर से पत्रकारिता एवं जनसंचार की पढ़ाई की है. पॉलिटिक…और पढ़ें
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