रीवाः रीवा के विटनरी हॉस्पिटल में पदस्थ डाॅक्टर एके मिश्रा बताते हैं कि कोयल शर्मीली होने के साथ-साथ चतुर भी होती हैं, क्योंकि वे शिकारियों से खुद को सुरक्षित रखने के लिए ऊंचे पेड़ों की सबसे ऊपरी शाखाओं पर बैठती हैं. हम अक्सर कोयल के गीत सुनते हैं, लेकिन उन्हें अक्सर देख नहीं पाते. लेकिन कोयल की चतुराई सिर्फ इतनी ही नहीं है. अधिकांश पक्षियों के विपरीत, वे अंडे देने के लिए घोंसला बनाने में मेहनत नहीं करतीं, न ही अंडे सेती हैं और न ही चूजों को पालती हैं. वे ये सारे काम दूसरों से करवाती हैं.
कोयल पक्षी के लिए अनुकूल है क्षेत्र
विंध्य क्षेत्र का वातावरण कोयल पक्षी के लिए काफी अनुकूलित माना जाता है, यही कारण है कि कोयल की खूबसूरत सी सुरीली आवाज को आप विंध्य क्षेत्र के मुकुंदपुर की वादियों में बड़े आराम से सुन सकते हैं. वैसे तो कोयल का प्रजनन काल गर्मियों में शुरू होता है. लेकिन सर्दी के मौसम में वो घोंसले की तलाश शुरु कर देती है जहां उसे अंडे देने होते हैं. कोयल अपने अंडे कौवे, मैना, सारस आदि जैसे अन्य पक्षियों के घोंसलों में देती है, जब वे आसपास नहीं होते. अंडे देने की इस प्रक्रिया में, कभी-कभी मादा कोयल मेजबान पक्षी के कुछ अंडों को घोंसले से गिरा देती है या कभी-कभी उन्हें खा भी लेती है.
अंडे देने के बाद, मादा कोयल उन्हें सेने का काम मेजबान पक्षी पर छोड़ देती है. आमतौर पर मेजबान पक्षी अपने अंडों और कोयल के अंडों में अंतर नहीं कर पाता और इसलिए ऐसा कर देता है. दूसरे पक्षियों के घोंसलों में अंडे देने और फिर उन्हें छोड़ देने के इस व्यवहार को ब्रूड पैरासिटिज्म के नाम से जाना जाता है. लेकिन यह ‘धोखाधड़ी’ यहीं खत्म नहीं होती. जब अंडे फूटते हैं और चूजे बाहर आते हैं, तो मेजबान पक्षी फिर से यह पहचानने में विफल रहता है कि कुछ चूजे उसके अपने नहीं हैं. इसलिए, वह उन्हें अपने बच्चों की तरह ही खिलाता है. अंततः मेजबान पक्षी को एहसास होता है कि कुछ चूजे वास्तव में उसके अपने नहीं हैं और वह उन्हें छोड़ देता है. लेकिन तब तक, अधिकांश कोयल के चूजे उड़ना और अपना भोजन स्वयं ढूंढना सीख चुके होते हैं.
कौआ से भी चतुर है ये पक्षी
कौआ भले ही चतुर पक्षी हो, लेकिन कोयल उससे भी ज़्यादा चतुर होती है. एशियाई कोयल का जोड़ा कौए के घोंसले के पास बैठता है और नर कोयल उसे परेशान करने की कोशिश करता है. जैसे ही कौए नर कोयल को भगाने के लिए अपना घोंसला छोड़ते हैं, मादा कोयल इस मौके का फायदा उठाकर कौए के घोंसले में अंडे दे देती है. इस तरह, अक्सर कोयल अपने अंडों को सेती है और चूजों को पालती है. जब तक बेचारे कौए के जोड़े को एहसास होता है कि उनकी मेहनत का फायदा किसी और को मिल गया है, तब तक कोयल के चूजे उड़ चुके होते हैं. इस पूरे समय कोयल आम के पेड़ों की डालियों पर मौज-मस्ती करती रहती हैं. जब कौए को इस बात का पता चलता है, तो वे उन चूजों को छोड़ देते हैं जिन्हें वे हफ्तों से पाल रहे थे.
जिसमें पैदा होती है उसी में अंडे देती है कोयल
यह कोई संयोग नहीं, बल्कि प्रकृति का कमाल है. साइंटिफिक रिसर्च बताते हैं कि जिस प्रजाति के घोंसले में कोयल खुद पली होती है, वह बड़ी होकर उसी प्रजाति के घोंसले में अंडा देती है. इसी वजह से उसके अंडे रंग, आकार और पैटर्न में बिल्कुल मेल खाते हैं. अगर गलती से गलत घोंसले में अंडा चला जाए, तो मेजबान पक्षी उसे पहचानकर बाहर भी फेंक सकता है. दरअसल, ऐसा नहीं है. दुनिया में कई और पक्षी और जीव भी इसी तरह की रणनीति अपनाते हैं. कुछ पक्षी अपने बच्चों को पालने की जिम्मेदारी दूसरों पर छोड़ देते हैं, तो कुछ मछलियां भी दूसरे जीवों को धोखा देकर अपने बच्चों को बड़ा करवाती हैं. इससे साफ होता है कि प्रकृति में सिर्फ मेहनत नहीं, बल्कि दिमाग भी उतना ही अहम है.
.