क्रिसमस केक की अनोखी यात्रा! जानिए कैसे साधारण बेर का दलिया बन गया दुनिया की सबसे पसंदीदा मिठाई, रोमांचक है यह कहानी

Christmas cake history: क्रिसमस की रौनक जैसे-जैसे बढ़ती है, बाजार, सड़कों, घरों के आस-पास जगमगाती लाइट्स, म्यूजिक और ताज़ा बेक होते केक की खुशबू माहौल को और भी खुशनुमा बना देती है. हालांकि आज जिसे हम रिच, डेकोरेटेड क्रिसमस केक के रूप में जानते हैं, उसकी शुरुआत किसी फैंसी मिठाई से नहीं हुई थी. हैरानी की बात है कि पहला क्रिसमस केक दरअसल बेर के दलिये यानी Plum Porridge था. जी हां, पुराने समय में लोग एडवेंट के उपवास के बाद यह दलिया खाते थे, और धीरे-धीरे यही पौष्टिक रेसिपी  फलों, मसालों और फ्लेवर के साथ विकसित होता गया और आज यह क्रिसमस केक के रूप में पहचान बना लिया.

दलिये से शुरू हुआ क्रिसमस केक का सफर
कहानी ऐसी है कि सदियों पहले यूरोप में क्रिसमस एक महीने तक मनाया जाता था. 6 दिसंबर से 6 जनवरी तक. ठंड के मौसम में खेतों में काम कम होता था, इसलिए लोग लंबे समय तक त्यौहार का आनंद लेते थे. कहते हैं तब Advent (क्रिसमस से पहले का उपवास) के दौरान हल्का और सिंपल भोजन किया जाता था और उपवास खत्म होने पर लोग पेट को गर्माहट देने के लिए प्लम पोरिज बनाते थे, इसमें दलिया, मसाले, शहद और सूखे बेर मिलाए जाते थे. यह स्वाद में हल्का लेकिन ऊर्जा से भरपूर होता था.

16वीं सदी में दलिया ने बदला रूप
समय के साथ इस परंपरा में बदलाव आने लगे. 16वीं सदी में दलिया में आटा, अंडे, मक्खन और सूखे मेवे डाले जाने लगे. इसके साथ यह मिश्रण गाढ़ा होकर केक जैसा बनने लगा. इसी दौर में मसाले ज़्यादा लोकप्रिय हो गए थे. माना जाता था कि ये मसाले तीन बुद्धिमान पुरुषों द्वारा बालक यीशु को दिए गए उपहारों का प्रतीक हैं. इस वजह से मसालों का उपयोग इस “त्यौहार वाले केक” को और खास बना देता था.

अमीर परिवार अपना रुतबा दिखाने के लिए इसमें खूब सारे ड्राई फ्रूट्स, मर्ज़िपैन और शुगर डेकोरेशन डालकर इसे रॉयल रूप देते थे. धीरे-धीरे यह व्यंजन आज के “क्रिसमस केक” के रूप में बनने लगा, लेकिन इसकी सबसे दिलचस्प परंपरा अभी आने वाली थी.

राजा-रानी जश्‍न वाला केक
क्रिसमस के पुराने जश्न में 6 जनवरी यानी ट्वेल्थ नाइट बहुत खास होती थी. उस दिन घरों में एक बड़ा सजाया हुआ केक बनाया जाता था, जिसे Twelfth Night Cake यानी राजा-रानी वाला केक कहा जाता था. इसके अंदर एक सूखी फलियाँ और एक सूखा मटर छिपाया जाता था. जिस व्यक्ति को मटर वाला हिस्सा मिलता था, वह “King for the Day” बनता. और जिसे फलियाँ मिलती, वह “Queen for the Day.” यह परंपरा मज़ेदार भी थी और सामाजिक बराबरी का प्रतीक भी, क्योंकि केक सभी लोग (मालिक हों या नौकर) साथ बैठकर खाते थे.

औद्योगिक क्रांति ने बदल दी परंपरा
18वीं–19वीं सदी में औद्योगिक क्रांति आया और लोगों की भागदौड़ भरी जिंदगी शुरू हो गई. महीनों तक चलने वाला क्रिसमस अब एक दिन में सिमटने लगा. ट्वेल्थ नाइट का महत्व कम हो गया और उसके केक को “Christmas Cake” कहा जाने लगा. 1870 के दशक में रानी विक्टोरिया ने आधिकारिक रूप से Twelfth Night के त्योहार को बंद कर दिया, क्योंकि उन्हें डर था कि बड़े जश्न बेकाबू हो सकते हैं. इसके बाद से क्रिसमस केक पूरी तरह से 25 दिसंबर से जुड़ गया.

आज का क्रिसमस केक यानी सदियों पुरानी कहानी का स्वाद
आज हम जिस रिच फ्रूट केक में रम, दालचीनी, जायफल, चेरी, किशमिश और बादाम का स्वाद लेते हैं, उसके हर एक तत्व का अपना एक इतिहास है. यह सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि सदियों से बदलती परंपरा, संस्कृति और यादों की कहानी है. मतलब साफ है कि क्रिसमस केक का हर स्लाइस इतिहास की एक मीठी और रोमांचक यात्रा छुपाए है.

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