नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ करने की परंपरा: दुर्गा सप्तशती में है मधु–कैटभ का जिक्र, देवी की प्रेरणा से ही भगवान विष्णु ने किया था मधु-कैटभ का वध

10 मिनट पहले

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आज नवरात्रि का छठा दिन है। देवी पूजा के इस उत्सव में दुर्गा सप्तशती का पाठ करने की परंपरा है। माना जाता है कि दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से देवी भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। इस ग्रंथ में देवी दुर्गा की महिमा बताई गई है। इस ग्रंथ में मधु-कैटभ नाम के दो असुरों का जिक्र भी है। जानिए इनकी कथा…

सृष्टि की रचना से पहले की कथा है। उस समय सृष्टि प्रलयकालीन जल में डूबी हुई थी। सिर्फ भगवान विष्णु शेषनाग पर विश्रामरत थे, भगवान योगनिद्रा में लीन थे। उस समय विष्णु जी के कानों के मैल से दो महाशक्तिशाली असुर मधु और कैटभ उत्पन्न हो गए।

इन दोनों असुर ने वेदों को गहरे जल में छिपा दिया था। ब्रह्माजी सृष्टि की रचना कर रहे थे, लेकिन ये दोनों असुर ब्रह्माजी के इस काम में बाधा बन गए थे। ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे इन दोनों असुरों का अंत करें, लेकिन विष्णु जी गहरी योगनिद्रा में थे।

ब्रह्मा जी श्रीहरि की योगनिद्रा नहीं तोड़ सके, इसके बाद उन्होंने आद्याशक्ति महामाया देवी की स्तुति। देवी ब्रह्मा जी की प्रार्थना सुनकर प्रकट हुईं। इसके बाद देवी की प्रेरणा से विष्णु जी योगनिद्रा से जाग गए। ब्रह्मा जी ने विष्णु जी को मधु-कैटभ के बारे में बताया।

विष्णु जी ने देवी की प्रेरणा से मधु-कैटभ दोनों दैत्यों का वध कर दिया। महामाया, जिन्हें हम दुर्गा या शक्ति के रूप में जानते हैं, वही देवी भगवान विष्णु की चेतना में प्रवाहित हुई थीं। देवी ने अपनी उपस्थिति से विष्णु को जगाया और मधु-कैटभ का वध करने के लिए प्रेरित किया।

1 अक्टूबर को महानवमी और 2 अक्टूबर को दशहरा

शारदीय यानी आश्विन मास की नवरात्रि 22 सितंबर से शुरू हुई है। इस साल नवरात्रि 9 नहीं, 10 दिनों की है, क्योंकि चतुर्थी तिथि दो दिन थी। 1 अक्टूबर को महानवमी है और 2 तारीख को विजयादशमी मनाई जाएगी।

ये हैं नवरात्रि की शेष तिथियां…

  • 27 सितंबर- आश्विन शुक्ल पंचमी – स्कंदमाता: मातृत्व और करुणा का प्रतीक।
  • 28 सितंबर- आश्विन शुक्ल षष्ठी – कात्यायनी: न्याय और वीरता की देवी।
  • 29 सितंबर- आश्विन शुक्ल सप्तमी – कालरात्रि: नकारात्मक शक्तियों का नाश करने वाली।
  • 30 सितंबर- आश्विन शुक्ल अष्टमी – महागौरी: शांति और सौंदर्य का प्रतीक।
  • 1 अक्टूबर- आश्विन शुक्ल नवमी – सिद्धिदात्री: सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाली देवी।

ऋतु परिवर्तन के समय आती हैं चार नवरात्रियां

हिन्दी पंचांग के मुताबिक, एक साल में चार बार नवरात्रि मनाई जाती है, चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ मास में। इनमें से चैत्र और आश्विन की नवरात्रियां सामान्य (प्रकट) होती हैं, जबकि आषाढ़ और माघ की नवरात्रियों को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है, जो तांत्रिक साधनाओं और आध्यात्मिक प्रयोगों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। नवरात्रि ऋतुओं के संधिकाल में आती है। संधिकाल यानी वह समय, जब एक ऋतु समाप्त होकर दूसरी ऋतु शुरू होती है।

  • चैत्र नवरात्रि: शीत ऋतु के बाद ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत
  • आषाढ़ नवरात्रि: ग्रीष्म ऋतु के बाद वर्षा ऋतु की शुरुआत
  • आश्विन नवरात्रि: वर्षा ऋतु के बाद शीत ऋतु की शुरुआत
  • माघ नवरात्रि: शीत ऋतु के बाद वसंत ऋतु की शुरुआत

ऋतुओं का ये संधिकाल न केवल पर्यावरण में बदलाव लाता है, बल्कि हमारे शरीर और मन पर भी प्रभाव डालता है। ऐसे समय में उपवास, ध्यान और योग के माध्यम से शरीर और मन को संतुलित करना हमारे स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी होता है।

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