Satna News: शादी-ब्याह में मिलने वाले पीतल के बर्तन आज ज्यादातर घरों में अलमारी या शोकेस की शोभा बनकर रह गए हैं, लेकिन कभी यही बर्तन भारतीय रसोई और सेहत की रीढ़ हुआ करते थे. आधुनिक दौर में डिस्पोजेबल, क्रॉकरी और स्टील के बढ़ते चलन ने पीतल को पीछे धकेल दिया है, जबकि इसके भीतर छिपे औषधीय गुण आज भी उतने ही प्रभावशाली हैं. पुराने समय में लोग पीतल के बर्तनों को सिर्फ परंपरा नहीं बल्कि स्वास्थ्य की कुंजी मानते थे.
उचेहरा के कारीगरों ने खोले पीतल के राज
लोकल 18 से बातचीत में सतना जिले के उचेहरा निवासी 65 वर्षीय अशोक ताम्रकार बताते हैं कि पीतल के बर्तन बनाना उनका पुस्तैनी व्यवसाय है. उनके पिता और दादा भी यही काम करते थे. उनके बाद की भी पीढ़ी यही कार्य कर रही है. उचेहरा में बनाए जाने वाले फूल पीतल के बर्तन देशभर में प्रसिद्ध हैं. पूरे विंध्य क्षेत्र के लोग आज भी शादी और त्योहारों, खासतौर पर लड़की पक्ष द्वारा दहेज या पाऊं-पखरी के रूप में यहीं से बर्तन खरीदते हैं, लेकिन कार्यक्रम के बाद दुर्भाग्यवश उनका उपयोग नहीं किया जाता.
सेहत की जड़ पेट और समाधान पीतल
अशोक कहते हैं कि हमारी अधिकांश बीमारियों की जड़ पेट से जुड़ी होती हैं. अगर भोजन गलत धातु के बर्तन में बनाया या परोसा जाए तो उसका असर शरीर पर पड़ता है. जैसे तांबे की बोतल में पानी रखने से उसके औषधीय गुण बढ़ जाते हैं, वैसे ही पीतल के बर्तन में बना भोजन ज्यादा लाभकारी और स्वादिष्ट होता है. पुराने समय में लगभग हर घर में पीतल का पैना, हांडी और देगची इस्तेमाल होती थी.
गैस और कुकर ने बदली रसोई की तस्वीर
ग्रामीण इलाकों में पहले पीतल के पैने में चावल धोकर, ऊपर पुटकी रखकर पकाया जाता था जिससे स्वाद और पोषण दोनों बने रहते थे. गैस और प्रेशर कुकर के आने के बाद यह परंपरा धीरे-धीरे खत्म होती चली गई. साथ ही पीतल में भोजन करने की आदत भी गायब हो गई, जबकि इसके फायदे पीढ़ियों से आजमाए हुए थे.
गंभीर बीमारियों में भी माना जाता कारगर
कारीगरों और बुजुर्गों का मानना है कि पीतल के बर्तन में भोजन करने से बीपी, थायराइड, टीबी जैसी बीमारियों में राहत मिलती है और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से बचाव में भी यह सहायक हो सकता है. उनका दावा है कि जिन परिवारों में नियमित रूप से पीतल के पात्रों का उपयोग होता है, वहां बीमारियां कम देखने को मिलती हैं. यहां तक कि पीतल में बनी चाय का स्वाद भी अन्य बर्तनों से अलग और बेहतर होता है.
उपयोग से लेकर रिसेल वैल्यू तक खास
पीतल से कड़ाही, पटिला, हांडी, तवा जैसे खाना पकाने के बर्तन, थाली, कटोरी, गिलास जैसे खाने-पीने के बर्तन और परात, घी-शहद के डिब्बे व सजावटी सामान बनाए जाते हैं. खास बात यह है कि पीतल के बर्तनों की रिसेल वैल्यू भी होती है. पुराने समय में लोग इन्हें जरूरत पड़ने पर ट्रेड तक कर लेते थे.
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