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The pain of partition: प्रतिभा बताती है कि उनके पिता पाकिस्तान में रेलवे में नौकरी करते थे. हालात इतने खराब हो गए थे कि मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने हिंदू परिवारों पर हमले शुरू कर दिए. लोग घरों में घुसने लगे. जान-माल का खतरा बढ़ गया. ऐसे में एक भट्ट जी के बड़े घर में तीन-चार परिवार छुपकर रहने लगे. जहाज से भारत आने की योजना थी. लेकिन हालात के चलते यात्री जहाज नहीं आया. मजबूरी में सभी लोग मालवाहक जहाज में छुपकर बैठे. सामान चारों तरफ रखा था और बीच में परिवार बैठा हुआ था. तीन दिन-तीन रात की डरावनी यात्रा के बाद चौथे दिन वे मुंबई पहुंचे.
खंडवा जिले में आज भी ऐसे कई परिवार हैं, जिनकी जड़ें देश के सबसे दर्दनाक दौर भारत-पाकिस्तान विभाजन से जुड़ी हैं. इन्हीं में से एक है लौंडे परिवार जिसकी कहानी सिर्फ पलायन की नहीं, बल्कि साहस, संघर्ष और नए जीवन की मिसाल है. यह कहानी है 90 वर्षीय प्रतिभा लौंडे की, जिन्होंने बचपन में बंटवारे का वह दर्द देखा, जिसे आज भी याद कर उनकी आंखें नम हो जाती हैं.
Local 18 से बातचीत में प्रतिभा लौंडे बताती है कि उनका जन्म पाकिस्तान के सिंध प्रांत के कराची के पास कोठरी गांव में हुआ था जो उस समय हिंदुस्तान का हिस्सा था. उन्होंने चौथी तक की पढ़ाई वहीं की. साल 1947 में जब देश के दो टुकड़े हुए तो हालात अचानक बदतर हो गए. चारों तरफ डर, हिंसा और असुरक्षा का माहौल बन गया.
प्रतिभा बताती है कि उनके पिता पाकिस्तान में रेलवे में नौकरी करते थे. हालात इतने खराब हो गए थे कि मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने हिंदू परिवारों पर हमले शुरू कर दिए. लोग घरों में घुसने लगे. जान-माल का खतरा बढ़ गया. ऐसे में एक भट्ट जी के बड़े घर में तीन-चार परिवार छुपकर रहने लगे. जहाज से भारत आने की योजना थी. लेकिन हालात के चलते यात्री जहाज नहीं आया. मजबूरी में सभी लोग मालवाहक जहाज में छुपकर बैठे. सामान चारों तरफ रखा था और बीच में परिवार बैठा हुआ था. तीन दिन-तीन रात की डरावनी यात्रा के बाद चौथे दिन वे मुंबई पहुंचे. उस समय उनके पास कस्टम या कोई कागजी दस्तावेज तक नहीं थे. इसके बाद परिवार मुंबई, कोकण और अलग-अलग गांवों में भटकता रहा. आखिरकार पिता बच्चों को लेकर इंदौर आए, जहां प्रतिभा ने मैट्रिक तक पढ़ाई की. मां की तबीयत खराब होने के कारण आगे पढ़ाई छूट गई, लेकिन उन्होंने संस्कृत और हिंदी में शिक्षा ली, शिक्षिका बनीं और जीवन को आगे बढ़ाया.
आज प्रतिभा लौंडे अपने बेटे-बहू के साथ खंडवा में रहती हैं. 90 साल की उम्र में भी वह कहती है कि बंटवारे का दर्द कभी भुलाया नहीं जा सकता. हमने अपना घर, जमीन, रिश्तेदार और बचपन सब वहीं छोड़ दिया. वह सिर्फ देश का बंटवारा नहीं था, इंसानों का बंटवारा था. यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की है, जिन्होंने बंटवारे की आग में सब कुछ खोकर भी भारत की मिट्टी में फिर से जीवन बसाया.
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