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उत्तराखंड की पहाड़ियों में आज भी तिमिल के पत्तों से बनी पत्तलों का इस्तेमाल परंपरा के रूप में किया जाता है. शादी-ब्याह, पूजा, भोज या सामाजिक कार्यक्रमों में इन पत्तलों का उपयोग न केवल भोजन को पवित्र और स्वादिष्ट बनाता है, बल्कि यह स्वास्थ्य, स्वच्छता और पर्यावरण के लिए भी लाभकारी है. यह सदियों पुरानी परंपरा स्थानीय संस्कृति, विज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग का प्रतीक मानी जाती है.
उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में आज भी शादी-ब्याह, भोज, पूजा या सामाजिक कार्यक्रमों में तिमिल के पत्तों से बनी पत्तल का उपयोग किया जाता है. यह परंपरा सदियों पुरानी है और स्थानीय लोग इसे अपनी संस्कृति और सम्मान का प्रतीक मानते हैं. पुराने समय में घर की महिलाएं खुद पत्ते तोड़कर पत्तल बनाती थीं. आज भी कई गांवों में यह परंपरा जीवित है। माना जाता है कि तिमिल के पत्तों में परोसे गए भोजन से न सिर्फ स्वाद बढ़ता है, बल्कि यह भोजन को और भी पवित्र बनाता है.

तिमिल अंजीर प्रजाति का पौधा होता है, और इसके पत्तों में प्राकृतिक औषधीय गुण पाए जाते हैं. इनमें एंटीबैक्टीरियल और एंटीऑक्सीडेंट तत्व मौजूद रहते हैं, जो भोजन में बैक्टीरिया के विकास को रोकते हैं. इन पत्तों पर भोजन परोसने से भोजन अधिक सुरक्षित और स्वच्छ रहता है. पुराने लोग कहते हैं कि तिमिल की पत्तल में खाया गया भोजन पाचन तंत्र के लिए लाभकारी होता है और इससे भोजन जल्दी पचता है. यही कारण है कि पहाड़ों में इसे स्वास्थ्य का थाल कहा जाता है.

तिमिल के पत्तों में एक हल्की प्राकृतिक खुशबू होती है, जो भोजन में सुगंध और स्वाद दोनों बढ़ा देती है. जब गरम व्यंजन पत्तल में रखे जाते हैं, तो पत्तों से निकलने वाली हल्की महक भोजन में घुल जाती है. लोग बताते हैं कि दाल, चावल, पूरी और सब्जी जैसे पारंपरिक व्यंजन तिमिल की पत्तल में परोसे जाने पर और स्वादिष्ट लगते हैं. यह प्राकृतिक सुगंध न केवल भूख बढ़ाती है, बल्कि भोजन का अनुभव भी खास बना देती है.

तिमिल के पत्तों की एक विशेषता यह भी है कि ये अत्यधिक तैलीय भोजन को संतुलित कर देते हैं. यदि किसी व्यंजन में घी या तेल की मात्रा अधिक हो, तो पत्ते उसका अतिरिक्त तैलीयपन सोख लेते हैं. इससे भोजन हल्का महसूस होता है और पाचन में भी आसानी होती है. स्थानीय जानकार किशन मलड़ा ने लोकल 18 को बताया कि पहाड़ी व्यंजन जैसे पूरी-बड़, आलू की सब्जी या झोली जब इन पत्तलों में परोसे जाते हैं, तो उनका स्वाद परंपरागत और स्वास्थ्यवर्धक दोनों बन जाता है.

तिमिल के पत्तों की पत्तल पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल होती है. उपयोग के बाद ये पत्ते प्राकृतिक रूप से सड़कर मिट्टी में मिल जाते हैं, जिससे पर्यावरण को कोई हानि नहीं होती. इसके विपरीत, प्लास्टिक या थर्माकोल की प्लेटें प्रदूषण फैलाती हैं. इसलिए आज जब दुनिया प्लास्टिक मुक्त समाज की ओर बढ़ रही है, उत्तराखंड के गांव इस दिशा में पहले से ही उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं. यह परंपरा पर्यावरण संरक्षण की एक जीवंत मिसाल है.

भोजन के बाद बची हुई तिमिल की पत्तलें बेकार नहीं जातीं. ग्रामीण इन्हें पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल करते हैं. तिमिल के पत्तों में मौजूद पोषक तत्व गाय-भैंस जैसे पशुओं के लिए लाभदायक माने जाते हैं. यह प्रकृति से जुड़ा एक सुंदर उदाहरण है, जिसमें कुछ भी व्यर्थ नहीं का सिद्धांत साफ दिखता है. इस तरह तिमिल की पत्तलें न केवल मानव जीवन में उपयोगी हैं, बल्कि पशुधन के लिए भी पोषण का स्रोत बनती हैं.

पहाड़ों में महिलाएं तिमिल के पत्तों को जोड़कर पत्तल बनाने की कला पीढ़ियों से सीखती आई हैं. शादी-ब्याह या मेलों के मौसम में इन्हें बेचकर अतिरिक्त आमदनी भी की जाती है. यह ग्रामीण महिलाओं की आत्मनिर्भरता और स्थानीय संसाधनों के उपयोग की मिसाल है. आधुनिक युग में भी कई स्वयं सहायता समूह तिमिल की पत्तलें तैयार कर बाजार में बेच रहे हैं, जिससे यह परंपरा न केवल जीवित है, बल्कि रोजगार का साधन भी बन रही है.

आज के आधुनिक समय में जब लोग पर्यावरण अनुकूल विकल्पों की ओर बढ़ रहे हैं, तिमिल की पत्तलें फिर से लोकप्रिय हो रही हैं. कई पर्यावरण प्रेमी संस्थाएं अब विवाह या आयोजनों में प्लास्टिक की जगह इन पत्तलों के उपयोग को बढ़ावा दे रही हैं. यह परंपरा दिखाती है कि हमारे पूर्वज कितने वैज्ञानिक और पर्यावरण-सचेत थे. उत्तराखंड के गांव आज भी इस परंपरा को सहेजे हुए हैं, जो आधुनिक समाज को प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की सीख देती है.