दुनिया का वो देश, जिसका काम बगैर तेल के चल सकता है, खत्म किये जा रहे पेट्रोल पंप

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दुनिया का वो देश जिसका काम बगैर तेल के चल सकता है,खत्म किये जा रहे पेट्रोल पंप

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दुनिया में एक देश ऐसा भी है, जहां जमीन के नीचे गर्मी है, वहां से उस देश को गर्म पानी और एनर्जी भरपूर मात्रा में मिलती है. कई ग्लेशियर नदियां जो बिजली देती हैं. ये देश धीरे धीरे पेट्रोल बंद कर रहा है, उनकी जगह चार्जिंग स्टेशन लगा रहा है. इस देश के बारे में कहा जाता है कि अगर उसे तेल नहीं भी मिले तो बगैर हाय-हाय किच-किच के ये आराम से चलता रहेगा. उसको तेल की ज्यादा जरूरत ही नहीं

दुनिया का एक देश जैसा भी है, जिसे अगर तेल नहीं मिले तो उसका काम काफी हद तक बिना इसके चल सकता है. वो दुनिया के उन गिने-चुने देशों में है जो बिना तेल के भी अपनी ज्यादातर ऊर्जा जरूरत आराम से पूरी कर सकता है. इसका मतलब ये नहीं कि वहां बिल्कुल तेल इस्तेमाल नहीं होता लेकिन ये सच है कि इस देश की ऊर्जा व्यवस्था ग्रीन एनर्जी पर इतनी आधारित हो चुकी है कि वहां तेल की जरूरत बहुत कम रह जाती है. वहां पेट्रोल पंप भी धीरे धीरे बंद होते जा रहे हैं.

आइसलैंड धरती के उन इलाकों में है जहां जमीन के नीचे बहुत ज्यादा गर्मी और ज्वालामुखीय गतिविधि है. इसलिए वहां जमीन के नीचे से निकलने वाली गर्म भाप और गर्म पानी से बिजली बनती है और हीटिंग होती है और काफी हद तक किचन का भी काम चल जाता है. आइसलैंड में बहुत सारी ग्लेशियर नदियां हैं. इनसे बड़े पैमाने पर हाइड्रोपावर बनती है. इन दोनों की वजह से वहां की बिजली करीब 100 ग्रीन मानी जाती है.

जमीन के नीचे से गर्म पानी पाइपों से सीधे घरों तक आता है, इसलिए वहां हीटिंग के लिए तेल लगभग इस्तेमाल ही नहीं होता. आइसलैंड की बिजली का स्रोत 70 फीसदी हाइड्रो इलैक्ट्रिक है तो 30 जियोथर्मल. इसलिए उनको बिजली उत्पादन के लिए कोयला या तेल की जरूरत नहीं पड़ती. आइसलैंड को अक्सर ग्रीन एनर्जी का मॉडल कहा जाता है. कई देश वहां जाकर यह सीखते हैं कि जियोथर्मल ऊर्जा कैसे इस्तेमाल की जाए.

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अगर दुनिया में अचानक तेल खत्म हो जाए तो भी आइसलैंड को परिवहन क्षेत्र में चुनौती आएगी, लेकिन बाकी ऊर्जा सिस्टम काफी हद तक चलता रहेगा लेकिन उसके 40 फीसदी वाहन ईवी हो चुके हैं, तो काफी हद तक वो इस पर भी काबू पा सकते हैं. यहां की आबादी मुश्किल से 3.8 लाख है. यहां प्रचुर गर्म पानी और भाप है. बहुत सारी ग्लेशियर नदियां. प्रकृति ने ही उसे जियोथर्मल ऊर्जा का खजाना दिया है.

चूंकि उनके पास असीमित और सस्ती ‘जियोथर्मल एनर्जी’ है, वे बड़े-बड़े ग्रीनहाउस में साल भर सब्जियां और फल उगा सकते हैं, भले ही बाहर कितनी भी बर्फ क्यों न जमी हो. तेल की कमी से उनकी खेती पर वैसा असर नहीं पड़ेगा जैसा उन देशों पर पड़ेगा जो खाद और ट्रैक्टरों के लिए पूरी तरह तेल पर निर्भर हैं.

आइसलैंड ऐसा देश भी है, जहां पेट्रोल पंप धीरे धीरे बंद किये जा रहे हैं. सरकार और ऊर्जा कंपनियां धीरे-धीरे उनका महत्व कम कर रही हैं. उनकी जगह ईवी चार्जिंग नेटवर्क तेज़ी से बढ़ाया जा रहा है. फिर यहां सड़क नेटवर्क सीमित हैं और चार्जिंग नेटवर्क बनाना कमोवेश आसान.

आइसलैंड का चार्जिंग नेटवर्क सिस्टम काफी व्यवस्थित है. देश की हर सड़क पर हर 50–100 किमी पर फास्ट चार्जिंग स्टेशन हैं. उनसे लंबी दूरी की यात्रा भी संभव है. कई पुराने पेट्रोल पंप ऊर्जा स्टेशन में बदल रहे हैं. आइसलैंड में पर्यटन बहुत बड़ा उद्योग है. यहां होटल, गेस्टहाउस, शॉपिंग सेंटर अक्सर ईवी चार्जर उपलब्ध कराते हैं. पर्यटक रात भर में कार चार्ज कर लेते हैं.

बिजली सस्ती है. अधिकांश घर स्वतंत्र मकानों में हैं. इसलिए बहुत से लोग घर पर ही रात में कार चार्ज करते हैं. चार साल बाद वहां कोई पेट्रोल डीजल की कार नहीं दिखेगी. उन्हें बंद कर दिया जाएगा. हालांकि वहां मछली पकड़ने वाले जहाज, लंबी दूरी के ट्रक, हवाई जहाज और दूरदराज के ग्रामीण वाहन अभी पेट्रोल से चल रहे हैं.

वैसे आप कह सकते हैं कि आइसलैंड दुनिया के उन देशों में है जहां कई लोग कहते हैं कि अगर तेल अचानक खत्म भी हो जाए तो देश की ऊर्जा व्यवस्था काफी हद तक चलती रहेगी, क्योंकि उनकी बिजली, हीटिंग और किचन ईंधन पहले से ही पूरी तरह नवीकरणीय स्रोतों से चल रही है.

जनसंख्या के हिसाब से आइसलैंड अपेक्षाकृत छोटा है, लेकिन इसका कुल क्षेत्रफल 103,000 वर्ग किलोमीटर (39,768 वर्ग मील) है. यह आइसलैंड को दुनिया का 18वां सबसे बड़ा द्वीप और ग्रेट ब्रिटेन के बाद यूरोप का दूसरा सबसे बड़ा द्वीप बनाता है.

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