दिवाली पर आदिवासी समाज का ‘ठाठिया पर्व’ 5 दिन उत्सव, जहां होती है अनोखी रस्में 

भारत विविधताओं से भरा देश है. हर समाज, जाति और क्षेत्र की अपनी अनूठी परंपराएं हैं. ऐसा ही एक कम सुना और रोचक पर्व है – ‘ठाठिया पर्व’, जिसे मध्य प्रदेश के खालवा ब्लॉक के ठाठिया आदिवासी समाज द्वारा दिवाली के अवसर पर मनाया जाता है. यह पर्व अपनी संस्कृति, परंपरा और प्रकृति से जुड़ाव का अनोखा उदाहरण है. जहां आम लोग दिवाली पर दीप जलाकर लक्ष्मी-गणेश की पूजा करते हैं, वहीं ठाठिया समाज इस दिन पशु और देवताओं की पूजा करता है और अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता है. यह पर्व धनतेरस से भाईदूज तक पांच दिनों तक चलता है. इस दौरान समाज के सभी सदस्य पारंपरिक वेशभूषा पहनते हैं और गांवों में गीत, संगीत और नृत्य की गूंज सुनाई देती है.

स्थानीय लव जोशी बताते हैं कि यह पर्व केवल त्योहार नहीं, बल्कि समाज की जीवनशैली का प्रतीक है. जिस तरह भगवान कृष्ण ने गोकुल में गोवंश की सेवा की, उसी तरह ठाठिया समाज भी अपने पशुधन को ‘धन’ मानता है. उनका विश्वास है कि पशु ही उनकी असली संपत्ति हैं, जो जीवनयापन और आजीविका का आधार हैं. इसलिए इस दौरान वे अपने पशुओं को स्नान कराते हैं, सजाते हैं और विशेष पूजा करते हैं. खालवा ब्लॉक के लगभग 43 वनग्राम जैसे रोशनी, अंबाड़ा, मोहालखारी, पिपल्या और बाराकुंड में यह परंपरा सदियों से जीवित है. इस दौरान गांव में कोई कृषि कार्य या दैनिक श्रम नहीं किया जाता. सभी लोग सामूहिक रूप से पर्व में शामिल होते हैं. ढोल-मांदल की थाप पर पारंपरिक नृत्य होते हैं और महिलाएं लोकगीत गाती हैं. रात को अलाव जलाकर सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है.

धार्मिक भावनाओं को मजबूत कर 5 दिन होता है उत्‍सव 
ग्राम पंचायत रोशनी के सचिव राधेश्याम नागोले कहते हैं, “ठाठिया समाज के लोग वर्षों से पशुधन चराने का काम करते आए हैं. हमारे लिए गाय, बैल, बकरी सिर्फ जानवर नहीं, परिवार के सदस्य हैं. इसलिए दिवाली पर हम उन्हें पूजा के योग्य मानते हैं.” इस पर्व में हर दिन का अपना महत्व है. पहले दिन पशु पूजा, दूसरे दिन देव पूजा, तीसरे दिन समूह नृत्य, चौथे दिन सामूहिक भोज और अंतिम दिन आशीर्वाद एवं मेल-मिलाप का आयोजन होता है. यह पर्व न केवल धार्मिक भावनाओं को मजबूत करता है, बल्कि समाज में एकता, सहयोग और संस्कृति के प्रति गर्व की भावना भी जगाता है.

सादगी और सेवा ही असली पूजा
आज जब आधुनिकता में कई पारंपरिक पर्व धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं, ठाठिया समाज का यह उत्सव भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत उदाहरण है. यह याद दिलाता है कि असली समृद्धि केवल धन या दीपों की चमक में नहीं, बल्कि प्रकृति, पशु और समाज के प्रति सम्मान में है. ठाठिया पर्व यह संदेश देता है कि मानव और प्रकृति का रिश्ता अविभाज्य है. जब तक हम पर्यावरण और जीव-जंतुओं से जुड़ाव बनाए रखेंगे, हमारी संस्कृति जीवित रहेगी. यही इस पर्व की सबसे बड़ी सीख है- ‘जीवन में ठाठ नहीं, ठाठिया की तरह सादगी और सेवा ही असली पूजा है.’

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