आपकी सेक्स लाइफ बचा सकती है टेस्टोस्टेरोन थेरेपी ! अंग्रेज खूब हो रहे इसके दीवाने, UK में इसे लेकर छिड़ी बहस

Testosterone Therapy Myths Vs Facts: कई लोग अपने पार्टनर के साथ रोज संबंध बनाते हैं, तो कुछ लोग महीनों तक इंटीमेट नहीं होते हैं. ब्रिटेन में लोगों की रोमांटिक लाइफ तेजी से बिगड़ रही है और इसका असर उनकी जिंदगी पर बुरी तरह पड़ रहा है. UK के युवाओं में भी संबंध बनाने की इच्छा कम हो रही है. ऐसे में बड़ी संख्या में लोग टेस्टोस्टेरोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (TRT) का सहारा ले रहे हैं. कई लोग दावा कर रहे हैं कि इस थेरेपी से उनका लिबिडो बूस्ट हुआ है और वे पार्टनर के साथ पहले से कहीं ज्यादा इंटीमेट हो रहे हैं. पुरुष ही नहीं, बल्कि महिलाएं भी प्री-मेनोपॉज और मेनोपॉज के बाद इस थेरेपी से अपनी जिंदगी को बेहतर बना रही हैं. कई लोगों का दावा है कि यह थेरेपी उन्हें दोबारा यंग महसूस करा रही है.

BBC की रिपोर्ट के मुताबिक यूके में टेस्टोस्टेरोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (TRT) का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है और तमाम लोग बिना सोच-समझे यह थेरेपी करवा रहे हैं. प्राइवेट क्लीनिक लोगों को धड़ाधड़ यह थेरेपी प्रिस्क्राइब कर रहे हैं. हालात यह हैं कि लोग अब अपनी यौन समस्याओं के लिए इस थेरेपी को मैजिक मान रहे हैं. यूके में 2021 से 2024 के बीच टेस्टोस्टेरोन के प्रिस्क्रिप्शन में 135% की बढ़ोतरी बताई जा रही है. ऐसे में सवाल उठता है क्या यह सच में मैजिकल ट्रीटमेंट है या फिर हाइप और बिजनेस का खेल? इस बारे में एक्सपर्ट्स की राय जानना सभी के लिए जरूरी है, ताकि किसी भी परेशानी से बचा जा सके.
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यूके में पिछले 30 साल से लोगों के संबंध बनाने की फ्रीक्वेंसी में गिरावट दर्ज की गई है. रिसर्च बताती हैं कि 1990 में 16 से 44 वर्ष के लोग औसतन महीने में 5 बार संबंध बनाते थे, जो 2010 तक घटकर 3 बार रह गया. अब हालात इससे भी बदतर हो गए हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. डिजिटल दुनिया का बढ़ता प्रभाव, तनाव, डिप्रेशन, अकेलापन और बदलती लाइफस्टाइल जैसे फैक्टर्स लोगों की यौन जिंदगी को प्रभावित कर रहे हैं. मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और फिजिकल एक्टिविटी के कारण पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का स्तर कम हो रहा है, जो घटते लिबिडो और संबंध बनाने में कमी का एक बड़ा कारण हो सकता है. हालांकि हर कम टेस्टोस्टेरोन वाले व्यक्ति में कम लिबिडो हो, ऐसा जरूरी नहीं है.

चौंकाने वाली बात यह है कि महिलाओं में भी टेस्टोस्टेरोन को लेकर रुचि बढ़ी है. खासकर प्री-मेनोपॉज और मेनोपॉज के दौरान महिलाएं इस थेरेपी का सहारा ले रही हैं. कुछ महिलाओं का कहना है कि एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन के साथ टेस्टोस्टेरोन लेने से उनकी जिंदगी में सकारात्मक बदलाव आया है. हालांकि एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि महिलाओं के लिए टेस्टोस्टेरोन थेरेपी आमतौर पर तभी सुझाई जाती है, जब अन्य ट्रीटमेंट कारगर न हों. महिलाओं में बिना जरूरत इस थेरेपी से कई साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं. इससे चेहरे या शरीर पर ज्यादा बाल, मुंहासे, वजन बढ़ना या आवाज में बदलाव हो सकता है. पुरुषों में भी वजन बढ़ना, मूड स्विंग, गंजापन, लंबे समय तक दर्दनाक इरेक्शन और शुक्राणु उत्पादन में कमी जैसी दिक्कतें आ सकती हैं.

प्राइवेट क्लीनिकों की बढ़ती संख्या और सोशल मीडिया पर एग्रेसिव एडवर्टाइजमेंट ने इस बहस को और तेज कर दिया है. कई NHS डॉक्टर्स का आरोप है कि निजी क्लीनिक टेस्टोस्टेरोन को क्विक फिक्स की तरह बेच रहे हैं, जबकि असल समस्या कहीं अधिक जटिल हो सकती है. कुछ विशेषज्ञ इसे ग्रेवी ट्रेन यानी मुनाफे का जरिया भी बताते हैं. दूसरी ओर प्राइवेट क्लीनिक के एक्सपर्ट्स का कहना है कि वे उन लोगों की मदद कर रहे हैं, जिन्हें पब्लिक हेल्थ सिस्टम से पर्याप्त सहायता नहीं मिल पा रही.

डॉक्टर्स की मानें तो पुरुषों में 30-40 की उम्र के बाद टेस्टोस्टेरोन हर साल लगभग 1% घटता है, जो सामान्य उम्र बढ़ने की प्रक्रिया है. हर व्यक्ति को टेस्टोस्टेरोन रिप्लेसमेंट थेरेपी की जरूरत नहीं होती है. जिन पुरुषों में इसका स्तर बहुत कम जैसे 6 से 8 nmol/L से नीचे हो और स्पष्ट लक्षण दिखें, उन्हें मेडिकल मॉनिटरिंग में यह थेरेपी दी जा सकती है. महिलाओं के मामले में स्थिति और जटिल है, क्योंकि उनके मामले में ज्यादा सावधानी की जरूरत है. इसलिए बिना जांच और डॉक्टर की सलाह के हार्मोन लेना खतरनाक हो सकता है. केवल हार्मोन लेने से सब कुछ ठीक हो जाएगा, यह सोच गलत हो सकती है. अगर किसी को लिबिडो में कमी महसूस हो रही है, तो फुल बॉडी चेकअप करवाना चाहिए और लाइफस्टाइल सुधारनी चाहिए.

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