दांत बताएगा, कौन था वो? मिलिए खजाना खोजने वाले भारतीय डेंटिस्ट पिल्लई से

Dentist Success Story: डेंटिस्ट आमतौर पर अस्पतालों में या अपने क्लिनिकों में बैठते हैं और दांतों की बीमारियों का का इलाज करते हैं.आप और हम सभी को यही मालूम है न? लेकिन अहमदाबाद के इन डेंटिस्ट ने असल में बताया है कि एक डेंटिस्ट का काम सिर्फ दांतों की नाप सीधी करना, कैविटी का इलाज करना या दाढ़ निकालना नहीं होता.

23 राज्यों में 37,000 किलोमीटर सड़कें नापने के दौरान अहमदाबाद के रहने वाले गवर्नमेंट डेंटल कॉलेज और हॉस्पिटल के डॉ. जयशंकर पी. पिल्लई ने 2.2 लाख दांतों की गहन स्टडी की. इस काम में उन्हें पूरे पांच साल लगे, लेकिन इस दौरान उन्होंने कुछ ऐसा बना दिया जो भारत में अभी तक मौजूद नहीं था और आने वाली पीढ़ियां इस पर गर्व करेंगी.

डॉ जयशंकर पिल्लई ने एक ऐसा व्यवस्थित नक्शा यानि डेटाबेस तैयार किया है, जिसमें दांतों के माध्यम से यह पता चल जाता है कि देश भर में दांतों में किस तरह के बदलाव होते हैं, और उन बदलावों से किसी व्यक्ति की पहचान और उसके मूल स्थान के बारे में क्या पता चलता है. यानि आपदाओं में खो चुके लोगों को उनके दांतों के माध्यम से पहचाना जा सकता है कि वे कौन थे? महिला थे या पुरुष थे? दांत से ही किसी अपराधी का भी पता चल सकता है कि ये किसका है.

इन भारतीय डेंटिस्ट ने जो फॉरेंसिक डेंटल डेटाबेस तैयार किया है उसे न केवल सदियां याद रखेंगी बल्कि इनके काम की बदौलत सदियों पुरानी उलझी गुत्थियों को भी सुलझाया जा सकेगा. यह लाखों दांतों के विश्लेषण के बाद तैयार भारत का शायद सबसे व्यापक फोरेंसिक डेंटल मॉर्फोलॉजी डेटाबेस है. इस काम के लिए उन्हें हाल ही में नेशनल फोरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी (NFSU) से PhD की उपाधि मिली है. यह काम भारत में आपदाओं और अपराधों के पीड़ितों की पहचान करने के तरीके को बदल सकता है.

क्या है इस फॉरेंसिक डेंटल डेटाबेस में?
व्यावहारिक फोरेंसिक के लिहाज से देखें तो डॉ.पिल्लई की वर्गीकरण पद्धति अभी किसी व्यक्ति के मूल क्षेत्र की पहचान करने में 36 फीसदी और सिर्फ दांतों के नमूनों के आधार पर लिंग निर्धारित करने में 63 फीसदी सफलता दर हासिल करती है. उनका मानना ​​है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और एक बड़े डेटाबेस के इस्तेमाल से इन दोनों आंकड़ों में काफी सुधार किया जा सकता है.

अभी तक भारत का रिकॉर्ड था कमजोर
वास्तव में देखें तो डॉ. पिल्लई का काम एक बेहद महत्वपूर्ण कमी को पूरा करता है. कई पश्चिमी देशों की तुलना में भारत का डेंटल रिकॉर्ड डेटाबेस काफी कमजोर है, जिससे फोरेंसिक पहचान करना मुश्किल हो जाता है. जांचकर्ताओं को कभी-कभी डेंटल सबूतों से मिलान करने के लिए लोगों की मुस्कुराती हुई तस्वीरों पर निर्भर रहना पड़ता है. हालांकि एनएफएसयू के कुलपति और डॉ. पिल्लई के डॉक्टोरल गाइड डॉ. जेएम व्यास ने बताया कि आपदा पीड़ितों की पहचान करने में दांत अमूल्य होते हैं.

सदियों तक सुरक्षित रहते हैं दांत
डॉ. पिल्लई ने कहा कि दांत दशकों और सदियों तक सुरक्षित रह सकते हैं और पहचान के एक भरोसेमंद निशान के तौर पर काम कर सकते हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक इस डेटाबेस के आधार पर एक राष्ट्रीय डेंटल रजिस्ट्री स्थापित करने के प्रयास चल रहे हैं.

डॉ. पिल्लई ने आगे बताया, ‘मैंने दशकों से ओडोंटोलॉजी (दांतों की संरचना) के फोरेंसिक अनुप्रयोंगों पर बड़े पैमाने पर काम किया है, और इसलिए मैंने भारत के लिए दांतों की एक व्यवस्थित प्रोफाइल तैयार करने का फैसला किया. 2020 से 2025 के बीच, मैंने 23 राज्यों और छह अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों से नमूने इकट्ठा किए. कुल विश्लेषण में 2.23 लाख दांतों के मॉर्फोलॉजिकल (आकार-संबंधी) लक्षणों को शामिल किया गया.’

दांतों को लेकर म‍िले अहम सुराग 

डॉ. पिल्लई ने हर नमूने का 15 पैमानों पर मूल्यांकन किया. कुछ निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरणों से पूरी तरह मेल खाते थे. ‘दांतों की बनावट कई कारकों पर निर्भर करती है, लेकिन मेरे अध्ययन में, मुख्य ध्यान आनुवंशिक लक्षणों पर था. अलग-अलग जीन पूल के लिए, हमें अलग-अलग विशेषताएं मिलीं. इनमें से कई अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण से भी मेल खाती थीं.’

उन्होंने कहा, ‘उदाहरण के लिए, ‘कस्प ऑफ कैराबेलि’ एक ऐसी विशेषता है जो कोकेशियाई आबादी में ऊपरी जबड़े के पहले या दूसरे मोलर (दाढ़) पर पाई जाती है .भारत के कुछ हिस्सों में भी देखने को मिली.’ उनके नमूनों में मध्य एशियाई और पश्चिमी यूरोपीय आनुवंशिक आबादी के साथ भी संबंध दिखाई दिए.

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