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Artificial Lighting Disrupts Metabolism: एक नई स्टडी में पता चला है कि लगातार आर्टिफिशियल लाइट में रहने से शरीर की इंटरनल क्लॉक बिगड़ सकती है. इससे ब्लड शुगर कंट्रोल पर असर पड़ता है. रिसर्च के अनुसार दिन में प्राकृतिक धूप मिलने से हमारे शरीर का इंसुलिन बेहतर काम करता है और शुगर लेवल ज्यादा समय तक नॉर्मल रेंज में रह सकता है. अगर आप हर वक्त आर्टिफिशियल लाइट में रहते हैं, तो इससे डायबिटीज का रिस्क भी बढ़ सकता है.
Artificial Lighting Raises Diabetes Risk: आज के जमाने में लोगों को शहरों की चकाचौंध काफी आकर्षित करती है. एक तरफ जहां ग्रामीण इलाकों में रात के वक्त कम लाइट नजर आती है, जबकि शहरों के अधिकतर हिस्से रातभर आर्टिफिशियल लाइट्स से जगमग रहते हैं. खासतौर से लोगों के घर और ऑफिसेस में भी आर्टिफिशियल लाइट्स की भरमार होती है. चमचमाती लाइटें लोगों को अट्रैक्ट तो करती हैं, लेकिन अगर आप लंबे समय तक इन लाइट्स में रहेंगे और सूरज नहीं देखेंगे, तो डायबिटीज समेत कई बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है. यह बात एक रिसर्च में सामने आई है.
वैज्ञानिकों के अनुसार हमारा शरीर एक इंटरनल क्लॉक के आधार पर चलता है, जो यह तय करती है कि हमें कब नींद आएगी, कब हार्मोन रिलीज होंगे और शरीर शुगर को कैसे प्रोसेस करेगा. प्राकृतिक धूप इस बॉडी क्लॉक को सही समय पर सेट रखने में अहम भूमिका निभाती है. जब दिन में पर्याप्त धूप मिलती है, तो इंसुलिन बेहतर तरीके से काम करता है और ब्लड शुगर के उतार-चढ़ाव को कंट्रोल करने में मदद मिलती है. इस स्टडी का मतलब यह नहीं है कि धूप डायबिटीज का इलाज है, बल्कि यह दिखाती है कि छोटी-छोटी आदतें भी बड़ा फर्क डाल सकती हैं. ऑफिस में खिड़की के पास बैठना, दिन में थोड़ी देर बाहर टहलना, या बिल्डिंग डिजाइन में प्राकृतिक रोशनी को प्राथमिकता देने जैसै फैक्टर्स शुगर कंट्रोल में मददगार हो सकते हैं.
आजकल बड़ी संख्या में लोग 80 से 90 प्रतिशत समय घर या ऑफिस के अंदर आर्टिफिशियल लाइट के बीच बिताते हैं. सुबह घर के अंदर उठना, बंद गाड़ियों या मेट्रो में सफर करना, दिनभर ऑफिस की एक जैसी रोशनी में काम करना और रात को स्क्रीन की तेज रोशनी जैसे फैक्टर्स हमारे शरीर को गलत संकेत देते हैं. कांच की खिड़कियों के पास बैठने वाले लोगों को भी उतनी प्राकृतिक धूप नहीं मिल पाती, जितना वे सोचते हैं. ऐसे में बॉडी की नेचुरल क्लॉक बिगड़ जाती है. इस गड़बड़ी का असर सबसे ज्यादा डायबिटीज और प्रीडायबिटीज के मरीजों पर पड़ता है. जब बॉडी क्लॉक बिगड़ जाती है, तो इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ सकता है और ब्लड शुगर को कंट्रोल करना और मुश्किल हो जाता है.
सेल मेटाबॉलिज्म जर्नल में प्रकाशित इस स्टडी में टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों पर एक्सपेरिमेंट किया गया. शोधकर्ताओं ने एक ही तरह का खाना, नींद और एक्टिविटी रखते हुए कुछ दिनों तक मरीजों को प्राकृतिक धूप वाले कमरे में और कुछ दिनों तक सिर्फ आर्टिफिशियल ऑफिस लाइट में रखा. नतीजा यह निकला कि जिन दिनों मरीजों को ज्यादा नेचुरल डे-लाइट मिली, उन दिनों उनका ब्लड शुगर ज्यादा समय तक नॉर्मल रेंज में रहा और शरीर ने फैट को बेहतर तरीके से एनर्जी के रूप में इस्तेमाल किया. यह रिसर्च बताती है कि लाइट हाइजीन यानी सही समय पर सही रोशनी भी डायबिटीज मैनेजमेंट का जरूरी हिस्सा है.
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अमित उपाध्याय News18 Hindi की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें