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Success Story: यह कहानी है जांबाज सुधीर कुमार की. जिन्होंने कोरोना काल में अपना 35 लाख का कारोबार और जमा-पूंजी सब खो दिया. लोग समझने लगे थे कि अब सब खत्म हो गया, लेकिन हार मानने के बजाय उन्होंने अपनी रणनीति बदली और मशरूम की खेती में फिर उतर गए. आज वे न केवल कर्जमुक्त हैं, बल्कि इलाके के ‘मशरूम किंग’ बनकर दूसरों को रोजगार दे रहे हैं. जानिए इनकी कहानी.
हजारीबाग: हजारीबाग जिले के सदर प्रखंड अंतर्गत बैहरी गांव के निवासी सुबोध कुमार की कहानी आज के समय में संघर्ष, धैर्य और आत्मविश्वास की मिसाल बन चुकी है. सीमित संसाधनों से शुरुआत कर अपने दम पर आगे बढ़ने वाले सुबोध कुमार ने न सिर्फ अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया, बल्कि लाखों रुपये के कर्ज से उबरकर यह साबित कर दिया कि सच्ची मेहनत और सही रणनीति से हर मुश्किल को हराया जा सकता है.
2007 से मशरूम उत्पादन की शुरूआत की
सुबोध कुमार साल 2007 से मशरूम उत्पादन के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं. उन्होंने इस काम की बाकायदा प्रशिक्षण लेकर शुरुआत की थी. शुरुआती वर्षों में उनका व्यवसाय लगातार आगे बढ़ता रहा. स्थानीय बाजार में उनके मशरूम की अच्छी पहचान बन गई थी और इससे परिवार का भरण-पोषण भी सम्मानजनक तरीके से हो रहा था. मेहनत और गुणवत्ता के कारण उनका व्यवसाय स्थिर गति से आगे बढ़ रहा था और आर्थिक स्थिति भी संतुलित बनी हुई थी.
2020 कोरोना महामारी ने दिया बड़ा झटका
लेकिन वर्ष 2020 में आई कोरोना महामारी ने उनकी जिंदगी में बड़ा झटका दिया. लॉकडाउन, बाजार बंदी और सप्लाई चेन बाधित होने के कारण मशरूम उत्पादन और बिक्री दोनों पर गहरा असर पड़ा. इस दौरान उन्हें करीब 35 लाख रुपये का नुकसान उठाना पड़ा. हालात ऐसे हो गए कि उन पर भारी कर्ज चढ़ गया और परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर हो गई. एक समय ऐसा भी आया जब भविष्य को लेकर चिंता बढ़ने लगी थी.
लोकल 18 झारखंड से बातचीत के दौरान सुबोध कुमार बताते हैं कि उस कठिन दौर में कई लोगों ने उन्हें सलाह दी कि वह मशरूम की खेती छोड़कर बाहर जाकर कहीं नौकरी कर लें, ताकि कर्ज को जल्दी चुकाया जा सके. लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय अपने अनुभव और पहचान पर भरोसा किया. उनका मानना था कि जिस काम ने उन्हें पहचान दी है, उसी के जरिए वह दोबारा खड़े हो सकते हैं.
कोरोना के बाद सुबोध कुमार ने अपने काम करने के तरीके में बड़ा बदलाव किया. पहले जहां वह करीब 6 घंटे काम करते थे, वहीं अब उन्होंने 16 घंटे तक लगातार मेहनत शुरू कर दी. उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ उन्होंने बिक्री की रणनीति भी बदली. वह रोज सुबह 7 बजे हजारीबाग शहर के अंबेडकर चौक पर अपनी दुकान सजा लेते हैं और साल भर एक ही दाम पर मशरूम बेचते हैं. इससे ग्राहकों का भरोसा बना और बिक्री में लगातार बढ़ोतरी होती गई.
आज फिर पहुंचे बुलंदी पर
आज स्थिति यह है कि सुबोध कुमार लगभग पूरा कर्ज चुका चुके हैं. परिवार की आर्थिक हालत पहले से कहीं बेहतर हो गई है और उनका व्यवसाय फिर से पटरी पर लौट आया है. सुबोध कुमार की यह यात्रा उन लोगों के लिए प्रेरणा है जो मुश्किल समय में हार मानने लगते हैं. उनकी कहानी बताती है कि सही सोच, कड़ी मेहनत और आत्मविश्वास के साथ किसी भी संकट से बाहर निकला जा सकता है.
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मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें
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