9 मार्च 2026 को CBSE की क्लास 12 मैथ्स की परीक्षा हुई, जो सुबह 10:30 से दोपहर 1:30 बजे तक चली. इस पेपर में टॉप लेफ्ट कॉर्नर में एक QR कोड छपा था, जो CBSE ने 2018 से सिक्योरिटी मेजर के तौर पर इस्तेमाल कर रही है. यह QR कोड पेपर की असली होने की जांच के लिए होता है, ताकि लीक होने पर जल्दी पता चल सके. लेकिन छात्रों ने जब इसे स्कैन किया, तो सब हैरान रह गए- यह उन्हें रिक ऐस्टली के 1987 के गाने ‘Never Gonna Give You Up’ के यूट्यूब वीडियो पर ले गया. यह इंटरनेट का मशहूर प्रैंक ‘Rickroll’ है, जहां लोग मजाक में किसी को इस गाने पर रीडायरेक्ट करते हैं.
सोशल मीडिया पर यह खबर वायरल हो गई. परीक्षा खत्म होते ही पेपर की फोटोज शेयर होने लगीं, और छात्रों ने वीडियो बनाकर दिखाया कि QR स्कैन करने पर क्या होता है.
X (ट्विटर) पर पोस्ट्स में लोग हंस रहे थे, कुछ ने लिखा- ‘ये मेरी 2026 की लिस्ट में नहीं था CBSE.’ या ‘एग्जाम अथॉरिटी कितनी सीरियस हैं, देखिए!’. यह प्रैंक लाखों लोगों को चकित कर चुका है, और अब बोर्ड एग्जाम जैसे सीरियस मौके पर आ गया. CBSE ने बाद में क्लैरिफिकेशन जारी किया कि पेपर असली है, सिक्योरिटी से कोई समझौता नहीं हुआ, और QR कोड सिर्फ वेरिफिकेशन के लिए है. कुछ सेट्स में यह ऐसा लिंक दिखा, लेकिन बोर्ड ने इसे गंभीरता से लिया.
यह घटना QR कोड की ताकत और उसके मजेदार इस्तेमाल को दिखाती है. आइए जानते हैं QR कोड के बारे में विस्तार से.
QR CodeQR क्या होता है?
कोड एक छोटा सा 2D बारकोड जैसा पैटर्न है, जिसमें काले- सफेद वर्गों की ग्रिड होती है. यह तेजी से जानकारी स्टोर और पढ़ सकता है. आजकल हर जगह इस्तेमाल होता है – पेमेंट, टिकट, मेन्यू, प्रोडक्ट डिटेल्स मे भी.
QR Code का फुल फॉर्म क्या है?
QR Code का फुल फॉर्म क्विक रिस्पॉन्स कोड है. ‘Quick Response’ इसलिए क्योंकि इसे स्कैन करने पर तुरंत रिस्पॉन्स मिलता है- जैसे वेबसाइट, टेक्स्ट, कॉन्टैक्ट या वीडियो लिंक.
कैसे काम करता है QR Code?
QR कोड में जानकारी बाइनरी फॉर्म (0 और 1) में एन्कोड होती है. काले वर्ग 1 और सफेद 0 दर्शाते हैं. इसमें तीन बड़े स्क्वेयर (alignment patterns) होते हैं, जो कैमरा को बताते हैं कि कोड कहां से शुरू और खत्म होता है. बीच में डेटा, एरर करेक्शन और वर्जन इंफॉर्मेशन होती है. जब आप फोन से स्कैन करते हैं, कैमरा इमेज कैप्चर करता है, ऐप इसे डीकोड करता है और स्टोर की गई जानकारी (जैसे URL) को ओपन कर देता है. एरर करेक्शन की वजह से अगर कोड थोड़ा डैमेज भी हो, तो भी पढ़ा जा सकता है.
QR Code और Bar Code में अंतर?
बारकोड 1D होता है- सिर्फ क्षैतिज लाइनों से बना, जैसे दुकानों में प्रोडक्ट पर. इसमें बहुत कम डेटा (20-25 कैरेक्टर) स्टोर होता है, और स्कैन करने के लिए लाइनर स्कैनर चाहिए. QR कोड 2D है- दोनों दिशाओं (horizontal और vertical) में डेटा स्टोर करता है. इसमें हजारों कैरेक्टर (7000 तक alphanumeric, या 4000+ Kanji) रखे जा सकते हैं.
इसके लिए कोई स्पेशल स्कैनर नहीं, मोबाइल कैमरा से स्कैन हो जाता है. बारकोड सिर्फ नंबर या सिंपल कोड के लिए, जबकि QR कोड URL, टेक्स्ट, Wi-Fi डिटेल्स, पेमेंट आदि के लिए इस्तेमाल होता है. QR ज्यादा वर्सेटाइल और तेज है.
कब शुरू हुआ QR Code?
QR कोड का इस्तेमाल 1990 के दशक के मध्य से शुरू हुआ. 1994 में इन्वेंट होने के बाद DENSO WAVE ने इसे ऑटोमोटिव पार्ट्स ट्रैकिंग के लिए इस्तेमाल किया. 2000 के दशक में जापान में मोबाइल फोन के साथ पॉपुलर हुआ, जहां लोग QR से वेबसाइट एक्सेस करते थे. भारत और दुनिया में 2010 के बाद स्मार्टफोन के आने से यह बहुत कॉमन हो गया, खासकर COVID-19 में कॉन्टैक्टलेस पेमेंट और मेन्यू के लिए. आज हर जगह- एडवरटाइजमेंट, टिकट बुकिंग, एग्जाम पेपर तक- QR दिखता है.
कब और किसने बनाया QR Code?
QR कोड को 1994 में Masahiro Hara ने इन्वेंट किया, जो जापानी कंपनी Denso Wave (Toyota की सब्सिडियरी) में इंजीनियर थे. 1992 में उन्हें बारकोड स्कैनर को बेहतर बनाने का टास्क मिला, क्योंकि फैक्ट्री में पार्ट्स ट्रैकिंग धीमी हो रही थी. हारा और उनकी टीम (जिसमें सिर्फ एक और मेंबर था) ने 1.5 साल में QR कोड डेवलप किया. उन्होंने बोर्ड गेम ‘Go’ से इंस्पिरेशन लिया, जहां पोजिशनल इंफॉर्मेशन महत्वपूर्ण होती है. हारा ने पोजिशन डिटेक्शन पैटर्न ऐड किए, जिससे कोड तेजी से पढ़ा जा सके. DENSO WAVE ने इसे ओपन सोर्स जैसा रखा, कोई पेटेंट फीस नहीं ली, ताकि दुनिया भर में फैले. हारा को उम्मीद नहीं थी कि यह पेमेंट, मीम्स या एग्जाम पेपर तक पहुंचेगा.
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